सफलता कैसे प्राप्त करें?

सफलता कैसे प्राप्त करें - दुनिया का दस्तूर होता है कि वह चढ़ते सूरज को सलाम करती है फिर चाहे वह किसी भी क्षेत्र की बात हो। चढ़ते सूरज से मतलब सफल व्यक्ति से होता है।

हर सफल व्यक्ति दुनिया के लिए एक उदहारण होता है। सफल व्यक्तियों का अनुपात असफल व्यक्तियों के मुकाबले में नगण्य होता है अर्थात बहुत कम लोग अपनी मनमाफिक सफलता प्राप्त कर पाते हैं।

सफल व्यक्तियों में ऐसी क्या खास बात होती है कि वे सफल हो जाते हैं? क्या कारण है कि समान रूप से प्रयास करने वाले लोगों में से कुछ लोग ही सफल हो पाते हैं और बहुतायत में लोग असफल हो जाते हैं? क्या सफलता प्राप्त करना इतना ज्यादा मुश्किल है?

सफलता का कोई क्षेत्र विशेष नहीं होता है बल्कि हर क्षेत्र में सफलता और असफलता को समान रूप से तौला जाता है। हर क्षेत्र का सफल व्यक्ति उस क्षेत्र के शिखर पर होता है।

शिखर पर पहुँचना ही मनुष्य का परम लक्ष्य होता है तथा जब वह शिखर पर नहीं पहुँच पाता है तब वह अपने लक्ष्य से समझौता कर लेता है या फिर अपने भाग्य का प्रसाद समझकर ग्रहण कर लेता है।

कुछ लोगों को इच्छित लक्य्फ प्राप्त न होनें का जीवन भर मलाल रहता है परन्तु अधिकतर उसे अपनी नियति समझ कर जो मिला है उसे ही स्वीकार कर लेते हैं।

इच्छित सफलता नहीं मिलना ही जीवन की सबसे बड़ी असफलता होती है क्योंकि अनिच्छित कार्य अरुचिकर होता है। असफलता जीवन पर्यन्त सालती है।

ईश्वर ने हर इंसान को समान बनाया है तथा उनमे बुद्धिमता भी समान ही प्रदान की है परन्तु फिर ऐसे कौनसे कारण होते हैं कि कुछ ही मनुष्य अत्यधिक बौद्धिक होते है या समझे जाते हैं?

यह कतई भी आवश्यक नहीं है कि हर बुद्धिमान इंसान सफल ही हो। इस दुनिया में बहुत से ऐसे लोग भी होते हैं जो बुद्धिमता में दूसरों से बहुत आगे होते हैं परन्तु सफल नहीं हो पाते हैं।

बहुत से ऐसे लोग भी हैं जो अत्यधिक बुद्धिमान ना होते हुए भी अपने क्षेत्र में सफल हैं। दरअसल सफलता का सम्बन्ध बहुत से कारकों के साथ होता है और बुद्धिमता उनमें से सिर्फ एक कारक होता है।

अगर इंसान इस एक कारक में कमजोर है और अगर उसने अन्य कारकों में महारथ हासिल कर उन्हें अपने पक्ष में कर लिया है तो वह निश्चित रूप से सफल होगा।

सफलता प्राप्त करने के कारकों को सफलता प्राप्त करने के मूल मंत्र भी कहते हैं। इन कारकों में प्रमुख रूचिकर लक्ष्य, उचित योजना एवं उसका कार्यान्वन, दृढ़ संकल्प, समर्पण, परिश्रम, बुद्धिमता, आदि होते हैं।

सफलता के लिए पहला कारक रुचिकर लक्ष्य का चुनाव करना है। जिसने भी अपने लक्ष्य चुनाव करते समय अपनी इच्छा, अपनी रुचि का उचित ध्यान रखा है, वह निश्चित रूप से सफल हुआ है।

रूचिकर लक्ष्य मनुष्य का सपना होता है तथा सपना तभी पूरा हो सकता है जब वह रूचिकर हो। अरूचिपूर्ण कार्य तो सपनों में भी पसंद नहीं आता है तो फिर हम कैसे अरूचिपूर्ण कार्य को अपना लक्ष्य बना सकते हैं?

लक्ष्य का चुनाव करते समय हमें यह भी देखना चाहिए कि हमने जो लक्ष्य चुना है वो हमें कितना पसंद है। क्या हमने लक्ष्य सिर्फ इसलिए चुन लिया है कि वह हमारे लिए दूसरों ने तय कर दिया है या फिर हम सिर्फ देखा देखी में ही लक्ष्य का चुनाव कर लेते हैं।

दूसरों के द्वारा तथा देखा देखी से तय किया गया लक्ष्य की सफलता के पथ पर बढ़ने की संभावना बहुत कम होती है।

लक्ष्य का चुनाव पूरी तरह से खुद पर तथा रूचिकर होना चाहिए। जब लक्ष्य रूचिकर नहीं होता है तब उसको प्राप्त करने के लिए जरूरी अन्य कारको जैसे समर्पण तथा मेहनत का अभाव होने लगता है परिणामस्वरूप सफलता की संभावना अत्यधिक क्षीण हो जाती है।

बहुत कम लोग ऐसे होते हैं जो अरूचिकर लक्ष्य के पश्चात भी सफलता प्राप्त कर लेते हैं। ऐसे लोग सिर्फ और सिर्फ अपनी मेहनत के बल पर सफल हो जाते हैं तथा इनका लक्ष्य भी बहुत छोटा होता है। बड़े लक्ष्य की प्राप्ति रूचिकर लक्ष्य के चुनाव के बिना पूर्ण नहीं हो सकती है।

उदाहरण के लिए अगर सचिन तेंदुलकर के पिताजी ने उन्हें खेल में क्रिकेट की बजाय किसी और खेल की शिक्षा दिलाई होती या फिर उन्हें खेल की जगह गायन सिखाया होता तो क्या आज वो इतनें सफल होते? निश्चित रूप से नहीं क्योंकि कहा जाता है कि पूत के पैर पालने में ही दिख जाते हैं।

अतः हमें हमारी नैसर्गिक प्रतिभा को पहचानकर उसी के अनुसार रूचिकर लक्ष्य का चुनाव करना चाहिए तभी हम सफलता की पहली सीढ़ी चढ़ पाएंगे।

सफलता के लिए दूसरा कारक उचित योजना एवं उसको कार्यान्वित करना है। रूचिकर लक्ष्य का चुनाव करने के पश्चात उसको पूर्ण करने के लिए उचित योजना का बनाना तथा उसको लागू करना सफलता प्राप्त करने के लिए दूसरा कदम होता है।

लक्ष्य के सभी पहलुओं की बारीकी से जाँच कर उसके लिए योजना को बनाना बहुत जरूरी है तथा फिर इसी योजना को पूरे मनोयोग से लागू करना चाहिए।

सफलता के लिए तीसरा कारक दृढ़ संकल्प होता है। दृढ़ संकल्प का मतलब दृढ़ निश्चय या पक्का इरादा होता है। अगर हममें लक्ष्य के प्रति पक्का इरादा होगा तो लक्ष्य हमारे मन में पूरी तरह से बस जायेगा तथा हर वक्त हमें हमारे लक्ष्य को प्राप्त करने के लिए सचेत करता रहेगा।

दृढ़ संकल्प की वजह से हमें सपनों में भी हमारा लक्ष्य ही नजर आएगा। दृढ़ संकल्प की वजह से हममें कार्य करने के लिए एक लगन पैदा हो जाती है या एक धुन सवार हो जाती है। यही लगन या धुन हमे कार्य करने को प्रेरित करती रहती है।

सफलता के लिए चौथा कारक समर्पण होता है। हमें लक्ष्य के प्रति पूर्णरूपेण समर्पित रहना होगा। जब किसी कार्य को पूर्ण समर्पण के साथ सम्पन्न नहीं किया जाता है तब सफलता प्राप्त करना संदिग्ध हो जाता है। हमें अपने आप को हमारे लक्ष्य के प्रति पूरी तरह से समर्पित कर देना पड़ेगा।

जब कोई किसी कार्य में समर्पित हो जाता है तो फिर वह कार्य उसका ध्येय बन जाता है। भक्त जब भक्ति में पूर्ण समर्पण के साथ लीन हो जाता है तब उसकी भक्ति सफल हो जाती है क्योंकि उसे चाहे भगवान की प्राप्ति हो या ना हो, वह स्वयं सद्गुणों को ग्रहण कर सच्चाई के पथ पर अग्रसर होकर प्रभु प्राप्ति के पथ पर एक कदम और आगे बढ़ा लेता है।

सफलता के लिए पाँचवा कारक कठोर परिश्रम होता है। किसी भी कार्य को सफल बनानें के लिए कठोर परिश्रम बहुत जरूरी होता है। बिना परिश्रम के कुछ नहीं मिलता है। परिश्रम दो तरह का होता है पहला शारीरिक परिश्रम तथा दूसरा मानसिक परिश्रम।

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केवल शारीरिक परिश्रम कभी भी इच्छित सफलता तथा बड़े लक्ष्यों की प्राप्ति में सहायक नहीं हो सकता है। अगर ऐसा होता तो शारीरिक मेहनत मजदूरी करने वाले लोग हर क्षेत्र में सफल होते।

सफलता के लिए मानसिक परिश्रम अत्यावश्यक होता है जिसे अंग्रेजी में स्मार्ट हार्ड वर्क कहते हैं। स्मार्ट हार्ड वर्क हमारे इच्छित लक्ष्य की प्राप्ति में सहायक होता है। अतः हमें अर्थपूर्ण स्मार्ट हार्ड वर्क करना चाहिए।

दुनिया में अधिकतर लोग अपने कठोर परिश्रम करने की वजह से भी सफल हो जाते हैं जैसे कई विद्यार्थी पढ़ने में अधिक बुद्धिमान नहीं होते है परन्तु वो अपनी मेहनत और लगन की वजह से सफलता प्राप्त कर लेते हैं। कई विद्यार्थी बहुत बुद्धिमान होते हुए भी मेहनत ना कर पाने की वजह से असफल हो जाते हैं।

सफलता के लिए छठा कारक बुद्धिमता का होना है। वैसे तो यह सबसे प्रमुख कारक होता है क्योंकि अगर किसी में किसी कार्य करने का उचित कौशल ही नहीं होगा तो वह सफलता प्राप्त नहीं कर सकता है परन्तु इसे आखिर में सिर्फ इसलिए रखा गया है क्योंकि आजकल देखा गया है कि बहुत से ऐसे भी क्षेत्र होते हैं जहाँ अधिक बुद्धिमता की आवश्यकता नहीं पड़ती है।

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सभी कार्य अधिक बुद्धिमता वाले क्षेत्रों से नहीं जुड़े होते हैं। उदाहरण के तौर पर अगर किसी को खिलाड़ी या फिर गायक बनना है तो उसके लिए अधिक बुद्धिमता की आवश्यकता ना होकर अन्य कारक अधिक प्रभावी हो जाते हैं।

अधिकतर बुद्धिमता को शिक्षा के क्षेत्र से जोड़ दिया जाता है तथा शिक्षित होना ही बुद्धिमता की निशानी समझा जाता है जबकि वास्तविक जीवन में ऐसा नहीं होता है।

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ऐसा जरूरी नहीं है कि जो अधिक शिक्षित होता है वह सफल ही हो तथा जो अल्प शिक्षित हो वह असफल हो। शिक्षा और अनुसन्धान के क्षेत्र के अलावा अन्य सभी क्षेत्रों में सभी तरह लोग सफल हो सकते हैं।

वैसे भी कहा जाता है कि जो जितना अधिक पढ़ लिख जाता है वह किसी के यहाँ नौकरी करने से अधिक नहीं सोच पाता है। सार्वजनिक जीवन में भी यह अधिक देखा जाता है कि अधिक पढ़े लिखे लोग अक्सर नौकरी करने को प्राथमिकता देते हैं तथा कम पढ़े लोग नौकरी न कर कोई व्यापार करके नौकरी देने को प्राथमिकता देते हैं।

अतः हम यह कह सकते हैं कि अगर सफलता के लिए बताए गए सभी कारकों या मूल मंत्रो का ईमानदारी से पालन करने के पश्चात असफलता के लिए कोई जगह नहीं रह जाती है तथा निश्चित रूप से सफलता की प्राप्ति होगी।

सफलता कैसे प्राप्त करें? How to get success?

Written by:
Ramesh Sharma

ramesh sharma pharmacy

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