सितारों के जीवन का वास्तविक परिचय

सितारों के जीवन का वास्तविक परिचय - फिल्मी दुनिया बड़ी निर्मम होती है। यहाँ पर सिर्फ चढ़ते हुए सूरज को ही सलाम किया जाता है। ढलते सूरज को कोई देखना भी पसंद नहीं करता है। ढलते हुए सूरज के पास सिवाए अन्धकार के कुछ भी नहीं रह जाता है। फिल्मी दुनिया में कलाकारों को सूरज ना कहकर सितारा कहा जाता है।

जब यह सितारा अपने चरमोत्कर्ष पर होता है तो इसे सुपर सितारा कहा जाता है। चरम पर सितारे को चाटुकारिता से परिपूर्ण राजसी वैभवयुक्त वह सम्मान मिलता है जिसकी कल्पना भी वह अपने संघर्ष के दिनों में नहीं कर पाता है। सितारे के सन्निकट चाटुकारों की खरपतवार पैदा हो जाती है। आज तक बहुत कम सितारे चाटुकारिता रुपी खरपतवार से बच पाए हैं।

जब सितारा शिखर पर नहीं रहता है तब चाटुकारों की खरपतवार इस कदर गायब हो जाती है मानो किसी ने खरपतवार को कीटनाशक से समाप्त कर दिया हो। ऐसे बहुत से सितारे हैं जिन्होंने शिखर के दिनों में बहुत अच्छा समय गुजरा है परन्तु शिखर का समय गुजरने पर बड़ी दयनीय हालत में जीवन काटा है।

जिस प्रकार जवानी शिखर का प्रतीक होती है, ठीक उसी प्रकार बुढापा शिखर से च्युत हो जाने का प्रतीक होता है। बहुत से सितारे अपना शिखर समय गुजर जाने के पश्चात भी उन्ही शिखर दिनों की याद में जिन्दा रहते हैं। ये इस सच्चाई को स्वीकार ही नहीं कर पाते है कि अब उनका समय जा चुका है। समय बड़ा बलवान होता है। समय जब बदलता है तो जीवन में बड़े आमूलचूल परिवर्तन होते हैं। समय के परिवर्तन से राजा रंक हो जाता है तथा रंक राजा हो जाता है।

फिल्मी दुनिया तो पूर्णतया चमक दमक पर आश्रित दुनिया हैं। यहाँ मानवीय मूल्यों का मोल न्यूनतम तथा चमक दमक का मोल अधिकतम होता है। कहते हैं कि चमक दमक पर ही बाजार निर्भर करता है। चमकने वाली चीज ही बिकाऊ होती है। इसी प्रकार सितारों में भी वही सितारा सर्वाधिक बिकाऊ होता है जिसकी चमक दमक सर्वाधिक होती है।

इन्हें फिल्मी दुनिया में कोहिनूर की तरह माना जाता है। जब तक सितारा बाजार के हिसाब से चमक दमक से युक्त रहता है उसकी कद्र कोहिनूर की माफिक होती है। जिस दिन से यह चमक दमक फीकी पड़ने लग जाती है, उसी दिन से इज्जत तथा पहचान भी समानुपात में गिरना शुरू हो जाती है।

सितारे को अपनी चमक दमक बनाए रखने के लिए कठिन परिश्रम करना पड़ता है। उसे शारीरिक सौष्ठव पर अत्यधिक ध्यान देना पड़ता है। शरीर ही सितारों की दुकान होता है। आजकल अभिनेताओं के लिए बलिष्ठ शरीर तथा अभिनेत्रियों के लिए मादक शरीर प्रमुख आवश्यकता बन गई है। वह जमाना लद चुका है जब संजीव कुमार जैसे संजीदा अभिनेता सिर्फ अपने अभिनय के दम पर फिल्मी दुनिया में अपना डंका बजवाते थे।

अब सिर्फ अभिनय पर ध्यान नहीं दिया जाता है। अभिनय दोयम दर्जे पर चला गया है और प्राथमिकताएँ बदल गई हैं। आज सितारे को सफल होने के लिए बलिष्ठ शरीर, कुशल नर्तक, मार्शल आर्ट में निपुण तथा अंग्रेजी भाषा में पारंगत होना आवश्यक है। अभिनेत्रियों के लिए सर्वाधिक जरूरत की चीज आकर्षक तथा मादक जिस्म हो गई है।

वैसे भी फिल्मों में अभिनेत्रियों की भूमिकाएँ सिर्फ नाच गानों तक ही सिमट कर रह गई है। पुरुष प्रधान समाज में आदि काल से महिलाओं को भोग विलास तथा मनोरंजन की वस्तु ही समझा जाता रहा है। आलम यह है कि इन्हें शराब तथा कबाब के समतुल्य तक बताकर इनमे शामिल किया जाता है।

इस प्रकार हम कह सकते हैं कि फिल्मी दुनिया, जिसे फिल्म इंडस्ट्री कहा जाता है, काफी रहस्य तथा रोमांच से भरी हुई है। इसे मायानगरी भी कहा जाता है। यहाँ का जीवन तथा रहन सहन साधारण मनुष्य के जीवन से अत्यधिक भिन्नता लिए होता है। शायद इसी वजह से सभी के मन में इस इंडस्ट्री तथा इससे जुड़े लोगों के बारे में जानकारी प्राप्त करने की उत्कंठा होती है।

सितारों के जीवन का वास्तविक परिचय Introduction to the real life of film stars

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