मेरा घर कौनसा है?

मेरा घर कौनसा है? - दिल यही पूछता है कि मेरा घर कौनसा है?

बचपन से यही सुना है कि में इस घर में पराई हूँ
में तो बिना वजूद की एक नादान परछाई हूँ
मुझे यही भ्रम रहा कि में तो घर के कोने कोने में समाई हूँ
कचोटता मन और चिढ़ाते हुए घर को देखकर
दिल यही पूछता है कि मेरा घर कौनसा है?

बचपन में जब भाई के साथ घर में खेलती हूँ
कही अनकही, देखी अनदेखी परिस्थितियाँ झेलती हूँ
मुझे रखा जाता है एक अमानत की तरह संभालकर
अपने आप को एक बहुत बड़ी जिम्मेदारी के रूप में देखकर
दिल यही पूछता है कि मेरा घर कौनसा है?

खाने पीनें से लेकर पढ़नें लिखनें में अंतर
भाई हो जाता है बिना पूछे छूमंतर
मुझे हर जगह जाना पड़ता है पूछकर
हर जगह एक अजीब और छुपा हुआ सा पहरा महसूस कर
दिल यही पूछता है कि मेरा घर कौनसा है?

लड़कपन बीतनें लगा और जैसे जैसे उम्र बढ़नें लगी
घरवालों के मन में कई परेशानियाँ भी घर करनें लगी
कई लोग सचेत करनें लगे हैं कि बेटी होती है पराया धन और बंद तिजोरी की तरह
यह बात सुनकर और तड़पकर सीने में एक लम्बी सांस भरकर
दिल यही पूछता है कि मेरा घर कौनसा है?

जैसे जैसे में सयानी होने लगी
बंदिशों की एक नई कहानी होने लगी
जमानें की चिंता और पडौसियों का भय बढ़ने लगा
अधछलके आँसूओं से भीगे तकिये में मुँह छुपाकर
दिल यही पूछता है कि मेरा घर कौनसा है?

फिर एक वक्त वो भी आया जब मेरा विवाह हुआ
सबको देखकर ऐसा लगा कि जैसे कर्तव्यों का पूर्ण निर्वाह हुआ
जैसे एक बहुत बड़ी जिम्मेदारी आज पूरी हुई
“हमें न भूल जाना अपने घर जाकर” ये शब्द सुनकर
दिल यही पूछता है कि मेरा घर कौनसा है?

ससुराल में पहुँच कर अपने घर को निहारा
ढूंढनें लगी थी अपनापन और सहारा
पीहर जाने पर यही कहा जाता है कि “बहु अपने घर जा रही है”
ये बात सुनकर और समझते हुए नासमझकर बनकर
दिल यही पूछता है कि मेरा घर कौनसा है?

शायद औरत का अपना कोई वजूद नहीं होता
तभी तो जन्म से लेकर मृत्यु तक
त्रिशंकु की भांति पीहर और ससुराल में लटकती रहती हैं
“तेरा घर वो है” यही एक बात बार बार सुनकर
दिल यही पूछता है कि मेरा घर कौनसा है?

जिस घर में बीस पच्चीस साल जब बिताएं हों
जहाँ सब एक वृक्ष की अलग अलग शाखाएं हों
फिर वृक्ष के लिए सभी शाखाएं एक समान क्यों नहीं होती
सिर्फ एक प्रकार की शाखा को जिम्मेदारी और पराया धन देखकर
दिल यही पूछता है कि मेरा घर कौनसा है?

मेरा घर कौनसा है? Which is my house?

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