सेवानिवृति इंसान की सोच या जरुरत

सेवानिवृति इंसान की सोच या जरुरत - सेवानिवृति एक सम्मानसूचक शब्द प्रतीत होता है तथा सेवानिवृत व्यक्ति के लिए मन में यकायक ही कुछ सम्मान उमड़ पड़ता है। यह शब्द किसी को खुश करता है और किसी को डराता है।

कुछ लोग सेवानिवृति को कार्यो से मुक्ति और आराम का समय समझते हैं तो कुछ लोग इसे इंसान की दूसरी बेरोजगारी से परिभाषित करते हैं।

ज्यादातर सेवानिवृति का मतलब सरकारी सेवाओं से कार्यमुक्ति को ही समझा जाता है। निजी सेवाओं में कार्यरत कर्मियों के लिए इसका ज्यादा मतलब नहीं निकलता है क्योंकि उनमें से अधिकाँश को सेवानिवृति के पश्चात नया कार्य खोजना होता है।

साधारणतया सरकार साठ वर्ष की आयु पर सेवानिवृति दे देती है। सेवानिवृति का सीधा सीधा मतलब यही होता है कि अब इस आयु में इंसान की क्षमताएँ कम हो गई है और वह कार्य करने में पहले की तरह उपयुक्त नहीं है।

सेवानिवृत व्यक्ति को जब जश्न के साथ विदाई दी जाती है तब दूसरे लोग सोचते हैं कि ये खुश किस्मत इंसान है जिसनें सफलतापूर्वक अपनी सेवा प्रदान की है जबकि सेवानिवृत व्यक्ति इस मंथन में लगा रहता है कि अब मुझे आगे क्या करना है।

सेवानिवृति के पश्चात व्यक्ति उसी बेरोजगारी और संघर्ष के दौर में वापस पहुँच जाता है जिनसे कभी उसने दो दो हाथ किये थे। बहुत से सेवानिवृत व्यक्तियों के लिए आर्थिक समस्याएँ भी पैदा होने लगती हैं, जिनसे पार पाना काफी कठिन हो जाता है।

सेवानिवृति के पश्चात व्यक्ति के जीवन में आमूलचूल परिवर्तन आने शुरू हो जाते हैं। व्यक्ति की सम्पूर्ण दिनचर्या में बदलाव आ जाता है, मानसिक स्थिति बदलने लगती है। सेवानिवृति से एक दिन पूर्व जो ऊर्जा थी वो समाप्त होने लगती है और अचानक से बुढ़ापे का अहसास होने लगता है।

कार्यस्थल नहीं होने से सारा दिन घर पर गुजारना पड़ता है जिसकी वजह से परिवार में बहुत से लोगों की उन्मुक्तता समाप्त होने लगती है और वो सारे दिन घर पर रहने को कोसनें लग जाते हैं।

पुरुष से यही अपेक्षा होती है कि वो कमाई करने के लिए दिन भर घर से बाहर रहे, उसका घर पर रहना समाज को गवारा नहीं होता। संगे-साथियों का अभाव व दूसरों से न मिलता संबल व्यक्ति को तोड़ने लग जाता है और असमय ही बुढापे के लक्षण प्रबल होते चले जाते हैं।

शारीरिक स्वास्थ्य के साथ-साथ मानसिक स्वास्थ्य भी स्वस्थ होना चाहिए अन्यथा विभिन्न प्रकार की बीमारियाँ चपेट में ले लेती है। उपरोक्त सभी स्थितियों से निपटनें के लिए हमें हमेशा किसी न किसी कार्य में लगे रहना होगा।

हमें हमारी सरकारी मानसिकता से बाहर निकलकर निजी सेवाकर्मियों की भाँती फिर से कुछ नया करना होगा ताकि हम पुन: पूर्ववर्ती परिस्थितियाँ प्राप्त कर सकें।

सेवानिवृति सरकार ने दी है और वो जरूरी भी है अन्यथा युवावों को नया रोजगार कहाँ से मिलेगा? हमें हमारी गिरती कार्यक्षमता के अनुसार कोई कार्य करना चाहिए ताकि वक्त भी गुजार जाये और हम संतुष्ट भी रह सकें।

सेवानिवृति इंसान द्वारा बनाये हुए नियमों में से एक है और यह प्राकृतिक नहीं है। हमने जानवरों में देखा है कि वो मृत्यु पर्यन्त अपना भोजन स्वयं प्राप्त करते हैं और कभी सेवानिवृत नहीं होते।

फिर इंसान में ऐसी क्या कमी है कि वो साठ वर्ष के बाद का जीवन बिना कार्य किये गुजारे? क्या साठ वर्ष पश्चात कार्य करना शर्मनाक है?

समाज भी इस मनोवृति को बढ़ावा देता है और हम अक्सर लोगों के मुखार्विन्दों से सुनते हैं कि “आपने तो सारी उम्र बहुत काम कर लिया अब तो आपके आराम करनें की उम्र है।”

क्या वाकई हम इतना कार्य कर चुके होते हैं कि हमें बाकी पूरी जिन्दगी आराम चाहिए? मनुष्य हमेशा मन से सेवानिवृत होता है तन से नहीं क्योंकि तन तो वही करता है जो मन करवाता है। मन अधिकतर समाज और लोक लाज के डर से ऐसा ही करता है जो समाज चाहता है।

अधिकतर सेवानिवृति का चलन व्यापार कर रहे व्यक्तियों पर लागू नहीं होता है और वे इसे अपने ऊपर लागू होनें भी नहीं देना चाहते हैं। व्यापार में लिप्त व्यापारी जब तक उसके हाथ पैर कार्य करते हैं तब तक कार्य करता रहता है।

जब तक हम कार्य करते हैं तब तक हम स्वस्थ रहते हैं और जब कार्य मुक्ति हो जाती है तब शरीर भी साथ देना छोड़ देता है। अतः हमें सेवानिवृति पूर्व एवं पश्चात हमेशा किसी न किसी कार्य में लगे रहना चाहिए।

सेवानिवृति इंसान की सोच या जरुरत Retirement is thought or need of person

Written by:
Ramesh Sharma

ramesh sharma pharmacy tree

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