बच्चों को पढ़ाई करनें के लिए कैसे प्रेरित करे?

बच्चों को पढ़ाई करनें के लिए कैसे प्रेरित करे? - आजकल जिस घर में नजर डालो उसी घर में सिर्फ एक ही नजारा देखनें को मिलता है जिसमे पेरेंट्स बच्चों की पढाई को लेकर बहुत चिंतित नजर आते हैं।

पेरेंट्स बच्चों को हर वक्त एक उपदेशक की भाँति उपदेश देते हुए नजर आते हैं जिसमे वो पढाई के फायदे बता रहे होते हैं और येनकेन प्रकारेण पढ़नें के लिए प्रेरित करते हुए नजर आते हैं।

बच्चों को पढ़ाई करनें के लिए कैसे प्रेरित करे

बच्चे उस उपदेश को सुनकर कुछ समय पश्चात अनसुना कर देते हैं और फिर खेलकूद में मस्त हो जाते हैं। उपरोक्त प्रक्रिया अक्सर दोहराव की तरफ बढती है परन्तु उस प्रक्रिया बहुत ज्यादा सकारात्मक परिणाम प्राप्त नहीं हो पाता है।

आखिर में ऐसे कौनसे कारण है जिनकी वजह से बच्चे पढाई से विमुख हो जाते हैं? क्यों बच्चों का मन पढ़ने लिखने में नहीं लग पाता है? बच्चों को पढ़नें के लिए प्रेरित करने की हमारी कोशिश क्यों असफल होती जा रही है?

हमें इन सभी कारणों पर गौर करना होगा अन्यथा बच्चों का भविष्य खतरे में पड़ सकता है और उन्हें असफलताओं का सामना करना पड़ सकता है। बच्चों की पढ़ाई के प्रति विमुखता के बहुत से कारण हो सकते है जिनमें से कुछ की विवेचना नीचे की जा रही है।

सबसे पहला कारण तो यह हो सकता है कि बहुत से पेरेंट्स बच्चों पर पढ़ने के लिए बहुत ज्यादा दबाब डालते रहते हैं। घर के जितने भी सदस्य होते हैं उनका बारी-बारी से यही कार्य होता है कि जब भी वो बच्चे को देखते हैं पढने के उपदेश देना शुरू हो जाते है।

सारे दिन एक ही बात को बार-बार सुनकर बच्चा तनाव में रहनें लग जाता है और परिणामस्वरूप पढ़ने के प्रति उसमे विमुखता आने लगती है।

हम सभी लोग यह बात अच्छी तरह जानते हैं कि किसी भी चीज की अति हमेशा नुकसानदायक होती है परन्तु बच्चों की पढ़ाई के मामले में हम जाने अनजाने यह अति कर बैठते हैं।

किसी भी बात की बार-बार पुनरावृति उसका असर खोनें लग सकती है अतः हमें पढ़ाई के लिए हमेशा बच्चों के पीछे नहीं पड़े रहना चाहिए।

दूसरा कारण हमारा बच्चों को जाने अनजाने हतोत्साहित करना होता है। बहुत से पेरेंट्स को अपने बच्चे का परीक्षा परिणाम और उसमे प्राप्त किये अंक कभी भी संतुष्ट नहीं कर पाते हैं और वो बच्चे से हमेशा और अधिक अंक लाने की अपेक्षा करते रहते हैं।

बच्चे ने भले ही क्लास में दूसरा स्थान प्राप्त किया हो तो भी उसे इस बात की डांट पड़ जाती है कि उसने प्रथम स्थान प्राप्त क्यों नहीं किया? अच्छे अंक आने पर भी बच्चे को प्रोत्साहित करने के बजाय दूसरे बच्चों से तुलना करके हतोत्साहित किया जाता है।

यह प्रवृति बहुत घातक होती है जो कि बाल मन पर प्रतिकूल असर डालती है और उसे दबाब में लाकर पढ़ाई से विमुख करने लगती है। पेरेंट्स को चाहिए कि परीक्षा परिणाम चाहे कैसा भी हो वो हमेशा बच्चे को प्रोत्साहित करे, न की हतोत्साहित करे।

प्रोत्साहन एक ऐसा संबल होता है जिसके मिलने पर मस्तिस्क में एक नई ऊर्जा का संचार होता है और किये गए कार्य को और अधिक गहनता से करने का मन करता है।

तीसरा प्रमुख कारण यह होता है कि बहुत से पेरेंट्स पढ़ने के लिए बच्चों का खेलना कूदना बंद कर देते हैं और जब देखो पढ़ने के पीछे लगे रहते हैं। बच्चों का खेलना कूदना बंद करके हम एक तरह से बच्चों के मानसिक विकास को अवरुद्ध करने लगते हैं।

अगर बच्चा मानसिक रूप से ही पूर्णतया विकसित नहीं हो पायेगा तो पढ़ाई किस तरह से कर पायेगा? पढ़ाई तो पूर्णतया मानसिक तौर पर स्वस्थ रहने पर ही की जा सकती है।

मानसिक स्वस्थता बहुत कुछ शारीरिक स्वस्थता पर निर्भर करती है अतः बच्चों के खेलने कूदने पर अघोषित प्रतिबन्ध लगाकर बचपन समाप्त नहीं करना चाहिए क्योंकि जितना पढना आवश्यक है उतना ही खेलना भी आवश्यक है।

चौथा कारण यह है कि बहुत से पेरेंट्स नौकरी करते हैं और जब माता-पिता दोनों ही नौकरी करते हैं तब बच्चों की परवरिश किराये पर उपलब्ध लोग किया करते हैं। आज के युग में संयुक्त परिवार तो लगभग समाप्त हो चुके हैं और परिवार का मतलब सिर्फ में, मेरी पत्नी और मेरे बच्चे ही होते हैं।

संयुक्त परिवार में पूरा कुटुम्ब ही एक घर में रहता था और बच्चों की परवरिश आसानी से हो जाती थी। एकाकी परिवारों में बच्चों पर पेरेंट्स का न तो अधिक ध्यान रह पाता है और न ही वो अपनी परेशानियों के चलते बच्चों पर ध्यान दे पाते हैं।

जब पेरेंट्स ही बच्चों की पढ़ाई पर ध्यान नहीं पायेंगे तो फिर कौन ध्यान देगा? कामकाजी पेरेंट्स को चाहिए कि वो पर्याप्त समय निकालकर बच्चों की पढ़ाई की तरफ समुचित ध्यान दें।

पाँचवा कारण हमारी दोषपूर्ण शिक्षा प्रणाली है जिसमें आधुनिकता की दौड़ में लार्ड मैकाले द्वारा शुरू किये गए सिद्धांतो को ही प्रचलित किया जा रहा है।

हम हमारी शिक्षा प्रणाली को न तो समुचित रूप से अंग्रेजी माध्यम की ही बना पाये हैं और न ही हिंदी माध्यम को प्रगति करवा पा रहे हैं। जिधर देखो उधर अंग्रेजी माध्यम के स्कूलों की बाढ़ आ रही है जो सिर्फ नाम के ही अंग्रेजी माध्यम के होते हैं।

इन तथाकथित अंग्रेजी माध्यम के स्कूलों में सिर्फ किताबें अंग्रेजी में होती हैं परन्तु सम्पूर्ण कार्य हिंदी में होते हैं। बच्चे पढ़ते तो अंग्रेजी की किताबे है और उनका विचार विमर्श हिंदी में होता है। शिक्षक भी इन अंग्रेजी की किताबों को हिंदी में पढ़ाते हैं।

इस अंग्रेजी और हिंदी के बीच बच्चा पिसने लगता है और वो न तो अंग्रेजी माध्यम का रह पाता है और न ही हिंदी माध्यम का रह पाता है परिणामस्वरूप पढ़ाई से विमुख होने लग जाता है।

हमें हमारी शिक्षा प्रणाली को बदलकर रूचिकर बनाना होगा तथा बच्चों के कन्धों से बस्तों का बोझ भी कम करना होगा। इन भारी भरकम बस्तों के बोझ तले बचपन कुचला जा रहा है।

अतः हमें उपरोक्त सभी कारणों का विश्लेषण कर आत्ममंथन करना होगा एवं बच्चों को बचपन के आनंद से विमुख न करते हुए उन्हें पढ़नें के लिए प्रेरित करना होगा।

बच्चों को पढ़ाई करनें के लिए कैसे प्रेरित करे? How to motivate children for studies?

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