व्यस्तता ही चिंता से निकलने का सर्वश्रेष्ठ तरीका

व्यस्तता ही चिंता से निकलने का सर्वश्रेष्ठ तरीका - चिंता मनुष्य का एक तरह से जन्मजात गुण है जैसे बचपन में खिलौनों की चिंता, जवान होने पर पढ़ाई तथा नौकरी की चिंता तथा वृद्ध होने पर बुढ़ापे की चिंता।

वैसे बुढ़ापे की चिंता तो जवानी से ही शुरू हो जाती है जब मनुष्य जवानी के साथ-साथ बुढ़ापे की भी चिंता में चिंतातुर होता रहता है।

अगर चिंता का एक पैमाना बनाया जाए तो सबसे कम चिंता का समय बचपन, उससे अधिक चिंता का समय बुढ़ापा तथा सबसे अधिक चिंता का समय जवानी का होता है।

मनुष्य के जीवन के ये तीन ही प्रमुख चरण होते हैं जिनके जरिये मनुष्य अपने जीवन की यात्रा को पूर्ण करता है। आखिर क्या कारण है कि मनुष्य को सारी चिंताएँ उसकी युवावस्था में ही घेरती हैं?

बचपन की चिंताएँ क्षणिक होती हैं इसके विपरीत जवानी में चिंताएँ अपना विकराल तथा चिरस्थाई सा रूप ले लेती हैं।

दरअसल जवानी का समय मनुष्य के जीवन का वह समय होता है जब मनुष्य की आवश्यकताएँ चरम पर होती हैं। इस समय में उसे दुनिया की हर चीज को पाने की ख्वाइश होती है।

जवानी का समय ही वह समय होता है जब मनुष्य के जीवन में सबसे ज्यादा उथल पुथल होती है। सबसे अधिक उथल पुथल की वजह जिम्मेदारी का अहसास होता है जो या तो स्वय या फिर समाज द्वारा येन केन प्रकारेण करवा दिया जाता है।

कई लोग वह सब कुछ प्राप्त नहीं कर पाते जिसे पाने की तमन्ना दिल में रखते आए हैं और बड़ी हसरतों से जीवन को जिया है।

कई लोग सक्षम होते हुए भी इच्छित सफलता प्राप्त नहीं कर पाने की वजह से परेशान होते हैं। जब हसरतें पूरी नहीं हो पाती है तब मनुष्य चिंता में घिर जाता है और जब हसरते पूरी हो जाती है तब जो कुछ पाया है उसे यथावत रखने की चिंता सताने लग जाती है।

कुल मिलाकर सफलता तथा असफलता दोनों ही स्थितियों में मनुष्य को चिंतातुर रहना पड़ता है। मनुष्य को चिंतामुक्त होने के लिए क्या करना चाहिए? चिंतामुक्त रहने का सर्वाधिक उपयुक्त तथा कारगर तरीका यह है कि हम अपने आप को बदलें।

हममें से अधिकतर लोग जब भी नैराश्य की वजह से या किसी अन्य कारण से चिंता में घिर जाते हैं तो काम करना बंद कर देते हैं तथा चिंतातुर होकर कुछ न कुछ सोचते रहते हैं। सोचते-सोचते घंटों बीत जाते हैं परन्तु हमारी चिंता कम नहीं होती है।

हमें अपनी इस आदत से छुटकारा पाना होगा तथा अपने आप को बदलकर बजाए चिंतातुर होकर बैठने के किसी न किसी कार्य में व्यस्त होना होगा। व्यस्तता चिंता दूर करने का रामबाण इलाज होता है।

व्यस्त रहने से हमारा ध्यान एक तरफ से हट कर दूसरी तरफ बँटता है जिसकी वजह से हमें चिंता के निवारण का अहसास होता है।

कहा जाता है कि खाली दिमाग शैतान का घर होता है इसलिए हमें कभी भी दिमाग को खाली नहीं रहने देना चाहिए।

जब दिमाग व्यस्त नहीं होता है तो उसमे कई प्रकार के अनर्गल विचारों का जन्म होने लगता है तथा ये अनर्गल ख्याल हमें सोने नहीं देते हैं। चिंतामुक्त जीवन जीने के लिए हमें हमारे विचारों पर भी नियंत्रण रखना चाहिए।

चिंता के अनेक कारण होते हैं जैसे लालसा, काम, क्रोध, लोभ, ईर्ष्या आदि। परन्तु चिंता का सर्वाधिक प्रमुख कारण होता है भ्रम या अनिश्चय। कोई भी मनुष्य यह नहीं जानता है कि भविष्य में क्या होने वाला है परन्तु भविष्य जानने की इच्छा सभी की होती है।

भ्रम की वजह से ही अनिश्चितता पैदा होती है तथा इस अनिश्चितता की वजह से सभी मनुष्य डरते हैं। अर्थात भ्रम की वजह से अनिश्चितता तथा अनिश्चितता की वजह से ही डर का जन्म होता है।

डर का मनुष्य के जीवन पर सकारात्मक तथा नकारात्मक दोनों प्रकार का प्रभाव पड़ता है। सकारात्मक प्रभाव तो सिर्फ कुछ लोगों पर ही पड़ता है परन्तु अधिकतम व्यक्तियों पर इसका नकारात्मक प्रभाव ही पड़ता है। यह डर मनुष्य को बालपन से ही सताने लग जाता है तथा जवानी में यह अपने चरम पर होता है।

बचपन में खिलौने जाने का डर, विद्यार्थी जीवन में परीक्षा परिणाम का डर, जवानी में करियर, नौकरी तथा भविष्य का डर, बुढ़ापे में सामाजिक तथा शारीरिक असुरक्षा का डर हमेशा सताता रहता है। हर स्थिति में डर की परिणति चिंता होती है।

किसी समझदार चिन्तक ने ठीक ही कहा है कि हमें चिंता नहीं बल्कि चिन्तन करना चाहिए। चिंता मनुष्य के शरीर का विनाश करती है जबकि चिंतन बुद्धि का विकास करता है।

चिंतन की वजह से ज्ञान तथा आत्म संतुष्टि का जन्म होता है और जहाँ ज्ञान तथा आत्म संतुष्टि होती है वहाँ चिंता का निवास नहीं हो सकता है।

व्यस्तता ही चिंता से निकलने का सर्वश्रेष्ठ तरीका Busyness is the best way to get over anxiety

Written by:
Ramesh Sharma

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