क्या अंग्रेजी माध्यम हिंदी माध्यम से बेहतर होता है

क्या अंग्रेजी माध्यम हिंदी माध्यम से बेहतर होता है- पढ़ाई के तौर तरीके इतने अधिक बदल गए हैं कि अब विद्यार्थी, विद्यार्थी न रहकर रोबोट बनते जा रहे हैं।

बच्चों को पढ़ाई सिर्फ इसलिए करवाई जा रही है कि वो अपनी परीक्षा में आने वाले विषयों को अच्छी तरह से तोते की तरह रटकर जब भी पूँछा जाए उसे सुना दे।

शायद पढ़ाई बौद्धिक विकास के लिए कम तथा अधिक से अधिक अंक प्राप्त करने के लिए करवाई जा रही है।

अंको की इस भागदौड़ में बच्चों के पढ़ने के लिए पाठ्यक्रम में भी अभूतपूर्व विस्तार हो गया है। जो बातें आज से बीस वर्ष पूर्व पाँचवी कक्षा के बच्चों को भी नहीं पढ़ाई जाती थी वे अब प्रथम कक्षा के बच्चों को पढ़ाई जा रही हैं।

क्या इसका मतलब यह निकाला जाए कि या तो हमारी पुरानी शिक्षा प्रणाली दोषपूर्ण थी या फिर आज की पीढ़ी पुरानी पीढ़ी से अधिक बुद्धिमान है?

आधुनिक शिक्षा प्रणाली में अभिभावकों का मुख्य उद्देश्य अपने बच्चों को अंग्रेजी माध्यम में शिक्षित करना है जिसके लिए उन्हें अपने बच्चों को अंग्रेजी माध्यम के विद्यालयों में प्रवेश दिलाना पड़ता है।

हर अभिभावक शायद यही समझते हैं कि अंग्रेजी माध्यम में पढ़ने वाले बच्चे हिंदी माध्यम में पढ़ने वाले बच्चों से अधिक बुद्धिमान होते हैं या फिर अंग्रेजी माध्यम हिंदी माध्यम से बेहतर होता है।

हिंदी माध्यम की पढ़ाई के साथ-साथ इसके विद्यालय भी सभी की नजर में दोयम दर्जे के हो गए हैं तथा यही समझा जाता है कि इनमे सिर्फ और सिर्फ मजबूर तबके के विद्यार्थी ही अध्ययन करते हैं।

सभी अभिभावक अपने बच्चों को अंग्रेजी माध्यम के अच्छे विद्यालय में पढ़ाना चाहते हैं। अच्छे विद्यालय से तात्पर्य वह विद्यालय समझा जाता है जिसकी शुल्क अधिक होती है तथा जो अधिक सुविधाएँ प्रदान करता है।

अब विद्यालय, विद्यालय न होकर एक शानदार होटल का सा रूप लेने लग गए हैं जिनमे कक्षाएँ पूरी तरह से वातानुकूलित होने लग गई हैं।

वातानुकूलित कक्षाओं के साथ-साथ साफ सुथरे तरणताल, खेलने के लिए अच्छे घास वाले मैदान तथा बच्चों के लिए मिनी थिएटर की भी व्यवस्था करने लगे हैं। विद्यालयों की तरफ से बच्चों के आवागमन के लिए वातानुकूलित साधन तक उपलब्ध होने लगे हैं।

आधुनिक समय में बच्चों की पढ़ाई के लिए शायद ये सभी चीजें सहायक होती है। क्या इन सभी सुविधाओं के साथ पढ़ने वाले सभी विद्यार्थी सफल होते हैं?

क्या उपरोक्त सुविधाएँ उपलब्ध नहीं करवाने वाले विद्यालयों के विद्यार्थी सफल नहीं होते हैं? क्या ये सभी चीजें आवश्यकताएँ होती हैं या फिर सुविधाएँ?

भाषा इंसान के संचार का प्रमुख माध्यम है। इंसान की मातृभाषा उसके बौद्धिक विकास में अत्यधिक सहायक होती है।

कोई भी व्यक्ति अपनी मातृभाषा में जितना अधिक सोच और समझ सकता है उसके मुकाबले अन्य भाषा में सोचना तथा समझना बहुत मुश्किल होता है। हमारे देश में विविध भाषाएँ तथा बोलियाँ हैं जिनमे हिंदी हमारी राष्ट्रभाषा है।

हम सभी के घर में हमारी मातृभाषा ही बोली और समझी जाती है। हिंदी भाषी राज्यों में हिंदी ही प्रमुखता से बोली जाती है तथा घरों में बच्चे तथा उनके अभिभावक हिंदी में ही वार्तालाप करते हैं।

एक हिंदी भाषी बच्चा जब अंग्रेजी माध्यम के विद्यालय में पढ़ने जाता है तब उसकी सभी किताबें तथा पढ़ने का माध्यम अंग्रेजी हो जाता है।

वह बच्चा विद्यालय तथा घर में अंग्रेजी से जूझता रहता है क्योंकि उसकी मात्रभाषा अंग्रेजी न होने से अंग्रेजी में उसकी समझ पूर्ण रूपेण विकसित नहीं हो पाती है।

हमारे देश में अंग्रेजी के अधिकतर विद्यालय कहने को तो अंग्रेजी माध्यम के विद्यालय होते हैं परन्तु इनमें पढ़ाना-लिखाना, बोलना आदि सभी हिंदी में होता है, केवल किताबें ही अंग्रेजी में होती है।

ऐसा अंग्रेजी में बच्चों की अक्षमता तथा कम वेतन में अप्रशिक्षित शिक्षकों द्वारा शिक्षा प्रदान करने के कारण से होता है।

दरअसल शिक्षा ने व्यापार का रूप ले लिया है जहाँ निस्वार्थ शिक्षा प्रदान करने के बनिस्पत धनार्जन ही प्रमुख ध्येय हो गया है। जब बच्चा सब कुछ हिंदी में ही कर रहा है तो फिर ऐसे अंग्रेजी माध्यम का क्या फायदा होता है?

जिन विद्यालयों में केवल अंग्रेजी ही संचार का माध्यम होती है वे विद्यालय इतने अधिक महंगे होते हैं कि आमजन की पहुँच से कोसो दूर होते हैं। इन विद्यालयों में अधिकतर धनाढ्य वर्ग के बच्चे ही पढ़ पाते हैं।

बच्चों की पढ़ाई में रुचि तब पैदा होती है जब उन्हें पढ़ी और पढ़ाई हुई चीजें अच्छी तरह से समझ में आती है। जब पढ़ाई समझ में ही नहीं आती है तब पढ़ने का मन भी नहीं करता है तथा बच्चे पढ़ाई से दूर भागने लगते हैं।

अधिकतर अभिभावक अपने बच्चों को वे या तो समयाभाव के कारण या फिर अंग्रेजी की पुस्तकें न पढ़ा पाने के कारण उन्हें ट्यूशन पढ़वानें के लिए विवश हो जाते हैं।

बच्चे विद्यालय में पढ़ने के पश्चात ट्यूशन में भी बहुत सा वक्त गुजारते हैं जिसकी वजह से उन्हें खेलने कूदने का पर्याप्त समय भी नहीं मिल पाता है परिणामस्वरूप उनके स्वास्थ्य पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ता है।

अभिभावकों की बढती अपेक्षाएँ भी बच्चों पर भारी पड़ रही हैं। नब्बे प्रतिशत अंकों को सामान्य समझा जाता है तथा शत प्रतिशत अंको के लिए ही प्रतिस्पर्धा हो रही है।

क्या बचपन को कुचलकर छोटी कक्षाओं में अधिकाधिक अंक प्राप्त कर लेने से बच्चे सफल हो सकते हैं।

हमें यह अच्छी तरह से समझना होगा कि अंग्रेजी एक भाषा मात्र से अधिक कुछ भी नहीं है। यह सच है कि अंग्रेजी आधुनिक युग में वैश्विक भाषा का दर्जा रखती है।

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अंग्रेजों के लिए इस भाषा को बोलना-समझना तथा इसमें पढ़ना-लिखना काफी आसान है क्योंकि यह उनकी मातृभाषा है।

आखिर हमारी ऐसी क्या मजबूरी है कि हम अपनी मातृभाषा में शिक्षित होने को हेय दृष्टि से देखते हैं तथा अंग्रेजों की मातृभाषा में शिक्षित होने को हमारा गौरव समझतें हैं?

शायद हम सचमुच लार्ड मैकाले की साजिश के शिकार होकर रंग रूप से भारतीय तथा मानसिक रूप से अंग्रेज हो गए हैं।

हम अंग्रेजों की दासता से अभी भी मुक्त नहीं होना चाहते हैं क्योंकि तभी तो हमने अभी भी अंग्रेजों की मानसिक गुलामी स्वीकार कर रखी है।

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अंग्रेजी बोलने वाले अयोग्य लोग भी हिंदी बोलने वाले योग्य लोगों के बनिस्पत अधिक सम्मान प्राप्त करते हैं। हमें हमारे बच्चों को सिर्फ अंग्रेजी बोलने में निपुण बनाने के लिए अंग्रेजी विद्यालयों में शिक्षा नहीं दिलानी चाहिए।

अंग्रेजी तो सिर्फ और सिर्फ एक भाषा होने के कारण किसी भी उम्र में सीखी जा सकती है परन्तु बच्चों की सोच और समझ सिर्फ बचपन में ही ढंग से विकसित हो सकती है।

हमें बच्चों को सिर्फ उनकी सोच और समझ को विकसित करने, उनका बौद्धिक विकास करने तथा विषय पर अच्छी पकड़ करने के लिए ही शिक्षित करना चाहिए न कि उन्हें रटने वाला तोता बनाने के लिए।

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बच्चा अगर अपनी मातृभाषा में पढ़ेगा तो वह उसे अच्छी तरह से समझ और याद कर पाएगा तथा बच्चों में रटने की प्रवृत्ति विकसित नहीं होगी।

कोई भी इंसान किसी चीज को तभी रटता है जब उसे वह चीज समझ में नहीं आती है। हमें रटने तथा याद करने के अंतर को भली भाँति समझना होगा।

सभी अभिभावकों को अपने स्तर पर भी एक सर्वेक्षण करना चाहिए कि सरकारी नौकरी प्राप्त करने वाले युवाओं में कितने प्रतिशत युवा अंग्रेजी माध्यम के हैं तथा कितने हिंदी माध्यम के।

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