ये दुनिया के बदलते रिश्ते

ये दुनिया के बदलते रिश्ते - “ना जाने कैसे, पल में बदल जाते हैं, ये दुनिया के बदलते रिश्ते”, बचपन में जब रेडियो पर रफी साहब का ये गाना बजता था तब ना तो इसका मतलब पता था और ना ही पता करने की कोई जिज्ञासा होती थी, महज दूसरे गानों की तरह इसे भी सुनकर भूल जाया करते थे।

जैसे जैसे उम्र बढ़ने लगी तब इस गाने के साथ साथ दूसरे कई गानों का मतलब भी समझ में आने लगा। फिर एक दौर ऐसा भी आया जब हर गाने में कुछ ना कुछ मतलब भी नजर आने लगा और हर गाना अपनी ही जिन्दगी पर लिखा हुआ सा प्रतीत होने लगा।

हर इंसान की जिन्दगी पर गानों का बहुत प्रभाव पड़ता है, ये तब महसूस हुआ जब लोगों को परिस्थितियों के हिसाब से गाने सुनते हुए देखा। खुशी के मौके पर लोग इकठ्ठे होकर तेज आवाज में झूमने वाले गाने सुनते हैं, वही लोग उदास होने पर तन्हाई ढूँढकर कोई उदास या भावुक गाना सुनते हैं।

गानों का जिन्दगी से बड़ा गहरा सम्बन्ध है, प्रत्यक्ष रूप से यह अनुभव सभी ने कभी ना कभी किया होगा। हर इंसान संबंधो को दो तरह से परिभाषित करता है, पहला जब वो कुंवारा होता हैं और दूसरा जब वो शादीशुदा जीवन की शुरुआत करता हैं।

शादी से पूर्व पुत्र के माता पिता के साथ जो सम्बन्ध होते हैं अक्सर शादीशुदा होने पर उनमे दरार आना शुरू हो जाती है। समय रहते इस दरार को पाटना जरूरी है अन्यथा ये दरार अनेक दरारों में बदलकर रिश्तों को दीमक की तरह खोखला कर समाप्त कर देती है और परिणाम बड़े अकल्पनीय होते हैं। अमूमन रिश्ते दम तौड़ देते हैं।

रिश्तों की ये दरारे, जो जाने अनजाने में शुरू होकर बहुत भयानक अंजाम तक पहुच जाती है, इनका जिम्मेदार कौन होता है?

ये दुनिया के बदलते रिश्ते

क्या इसका जिम्मेदार वो पुत्र होता है जिसपर माता पिता ने बचपन में अपना अतुलित प्रेम लुटाया, खुद भूखा प्यासा रहकर पाला पोसा या इसका जिम्मेदार वो माता पिता होते हैं जो शायद अपने पुत्र पर से अपना अधिकार समाप्त हो जाने के डर से अपने रिश्तों को उस अंजाम तक पँहुचा देते हैं जहाँ से लौटना असंभव हो जाता है या फिर वो दुल्हन जिम्मेदार होती है जो किसी अनजाने परिवार में अपने परिवार को छोड़ कर आती है और उस नए परिवार में अपने माता पिता, भाई बहन को ढूँढने के प्रयत्न में उम्र गुजार देती है।

रिश्ते कितने ज्यादा दिखावटी और रंग बदलू होते हैं यह बात शायद हर शादीशुदा इंसान समझता होगा क्योंकि उस इंसान ने विवाहित होने के पश्चात रिश्तो के कई रंग देख लिए होते हैं।

जब तक पुत्र कुंवारा होता है माता पिता का व्यवहार बहुत आत्मिक होता है लेकिन जैसे ही विवाह हो जाता है उन्ही माता पिता का नजरिया पुत्र के प्रति बदलना शुरू हो जाता है। कल तक जो परिवार एक इकाई होता था वो इकाइयों में विभक्त होना शुरू हो जाता है।

अगर माता पिता पुत्र की भावनाओं को समझें तथा उनकी इज्जत करें, पुत्रवधू में अपनी पुत्री की झलक देखें तो शायद ये रिश्ते टूटने से बच जाएँ। जब तक घर का मुखिया निष्पक्ष होकर अपनी भूमिका का निर्वाह नहीं करेगा तब तक इन संबंधो को ज्यादा वक्त तक नहीं बचाया जा सकता है।

कहने का मतलब ये कदापि नहीं है कि सारी जिम्मेदारी माता पिता की ही होती है परन्तु परिवार के मुखिया होने के नाते अधिक जिम्मेदारी तो बनती ही है।

जिनको जिन्दगी जीने का, रिश्तों को निभाने का ज्यादा अनुभव होता है उन्हें निष्पक्ष होकर अपने से छोटों के लिए पथ प्रदर्शक की भूमिका निभानी चाहिए। कहते हैं कि अधिक ताकत अधिक जिम्मेदारी देती है परन्तु अक्सर अधिक ताकत मनुष्य को तानाशाह बना देती है।

फिर मनुष्य उन्ही लोगों को अपने इशारों पर चलाना चाहता है जो लोग उन अधिकारों की ही मांग कर रहे होते हैं जिन अधिकारों की मांग कभी उसने खुद भी की थी।

ये दुनिया के बदलते रिश्ते Changing relations in life

Written by:
Ramesh Sharma

ramesh sharma smpr news

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