1G से 5G तक बदलती टेक्नोलॉजी का असर

1G से 5G तक बदलती टेक्नोलॉजी का असर - इन्टरनेट की भूमिका हमारे जीवन में भोजन तथा आवास की तरह होती जा रही है। बदलती टेक्नोलॉजी ने स्मार्टफोन पर इन्टरनेट का उपयोग इतना अधिक आसान कर दिया है कि बहुत से कार्य स्मार्टफोन के माध्यम से ही संपन्न होने लगे हैं। बाजार में नई-नई तकनीक युक्त स्मार्टफोन्स की भरमार है।

तकनीक इतनी तेजी से बदल रही है कि आधुनिकतम तकनीक युक्त समार्टफोन की आयु भी दो वर्षों से अधिक नहीं रह पा रही है।

बदलती तकनीक ने इन्टरनेट के प्रयोग को अधिकाधिक आसान कर दिया है। इन्टरनेट की डाउनलोडिंग तथा अपलोडिंग स्पीड शुरुआती दौर के मुकाबले हजारों गुना अधिक हो गई है। भारत में इन्टरनेट तथा वौइस कॉल के लिए हाल ही में लॉन्च हुई 4G तकनीक बहुतायत से काम आ रही है। बहुत जल्द ही 5G तकनीक भी लॉन्च हो जाएगी।

आखिर इस G का मतलब क्या है तथा किस प्रकार यह 1G से शुरू होकर 5G तक पहुँच रहा है। बहुत से लोगों को इस सम्बन्ध में अधिक जानकारी नहीं है अतः इस लेख के माध्यम से 1G, 2G, 3G, 4G और 5G का मतलब तथा इनमे अंतर पर प्रकाश डाला जाएगा।

सबसे पहले हमें G का मतलब पता होना चाहिए। दरअसल G का मतलब जेनरेशन से होता है। जब भी नई तकनीक पर आधारित वायरलेस फोन लॉन्च होता है तो उसे नेक्सट जेनरेशन का स्मार्टफोन कहा जाता है।

वक्त के साथ-साथ फोन की शक्ल और सूरत भी बदलती जा रही है। शुरुआत में वायर्ड फोन जिन्हें फिक्स्ड लाइन फोन भी कहा जाता था, प्रचलन में थे। फिर समय के साथ-साथ कार्डलेस फोन प्रचलन में आए तथा धीरे-धीरे यह पूरी तरह वायरलैस फोन में बदल गए। आज फिक्स्ड लाइन फोन दम तोड़ते प्रतीत होते हैं।

फर्स्ट जनरेशन वायरलेस नेटवर्क (1G)

इस तकनीक को सबसे पहले 1980 में अमेरिका में पेश किया गया था। यह तकनीक वायरलेस टेलीफोनी के सन्दर्भ में विश्व की पहली तकनीक मानी जाती है। इस तकनीक में एनेलोग सिग्नल का इस्तेमाल होता था। इस तकनीक में काम में लिए जाने वाले फोन्स की बैटरी लाइफ के साथ-साथ वॉयस क्वालिटी और सिक्योरिटी में भी बहुत खामियाँ थी।

इस तकनीक में रोमिंग की सुविधा का अनुपलब्ध होना इसकी सबसे बड़ी खामी थी। इसमें वेबपेज की अधिकतम साइज 25 केबी की होती थी। जीपीआरएस (जनरल पैकेट रेडियो स्विचिंग) के रूप में वायरलेस सर्विस 1997 में शुरू हुई जिसकी स्पीड 50 केबीपीएस थी। इसमें 800 एमबी की मूवी का कुल डाउनलोडिंग टाइम 1 दिन 12 घंटे 24 मिनट 32 सेकंड लगता था।

सेकंड जनरेशन वायरलेस नेटवर्क (2G)

जीएसएम (ग्लोबल सिस्टम फॉर मोबाइल कम्यूनिकेशन) पर आधारित यह तकनीक 1991 में फिनलैंड में शुरू हुई। यह जीएसएम पर आधारित डिजिटल सिग्नल युक्त तकनीक थी। इस तकनीक पर आधारित फोन्स से एसएमएस, कैमरा और ईमेल जैसी सर्विसेज को शुरु किया गया। इसमें वेबपेज की अधिकतम साइज 125 केबी की होती थी। ईडीजीई (एनहांस्ड डाटा रेट्स फॉर ग्लोबल एवोलुशन) के रूप में 2G वायरलेस सर्विस 1998 में शुरू हुई जिसकी स्पीड 250 केबीपीएस थी। इसमें 800 एमबी की मूवी का कुल डाउनलोडिंग टाइम 7 घंटे 16 मिनट 54 सेकंड लगता था।

थर्ड जनरेशन वायरलेस नेटवर्क (3G)

यह तकनीक 2001 में आई। इस तकनीक ने उपभोक्ताओं के लिए फोटो, टेक्स्ट और वीडियो के अतिरिक्त वीडियो कॉल तथा मोबाइल टीवी भी काफी आसान कर दिया। इस तकनीक की वजह से स्मार्टफोन को बढ़ावा मिला तथा सम्पूर्ण विश्व में स्मार्टफोन क्रांति का आगाज हुआ। इसमें वेबपेज की अधिकतम साइज 192 केबी होती है।

डब्लूसीडीएमए (वाइडबैंड कोड डिवीजन मल्टीप्ल एक्सेस), यूएमटीएस (यूनिवर्सल मोबाइल टेलीकम्यूनिकेशन्स सिस्टम) तथा एचएसडीपीए (हाई स्पीड डाउनलिंक पैकेट एक्सेस) के रूप में 3G वायरलेस सर्विसेज 2004 के आस पास शुरू हुई जिसकी स्पीड 384 केबीपीएस थी। इसमें 800 एमबी की मूवी का कुल डाउनलोडिंग टाइम 4 घंटे 44 मिनट 27 सेकंड लगता है।

फोर्थ जनरेशन वायरलेस नेटवर्क (4G)

यह तकनीक 2010 में शुरू हुई। यह तकनीक मुख्य रूप से डेटा के लिए डिजाईन की गई है तथा आईपी आधारित प्रोटोकॉल पर बेस्ड है। इसमें वेबपेज की अधिकतम साइज 50 एमबी होती है। एलटीई (लॉन्ग टर्म एवोलुशन) पर आधारित 4G वायरलेस सर्विसेज में स्पीड 50 एमबीपीएस तक होती है। इसमें 800 एमबी की मूवी का कुल डाउनलोडिंग टाइम 43 सेकंड लगता है।

फाइव जनरेशन वायरलेस नेटवर्क (5G)

यह तकनीक 2020 तक शुरू होने की सम्भावना है। यह भविष्य की वायरलेस तकनीक होगी जिसमे कनेक्टिविटी तथा स्पीड की कोई लिमिट नहीं होगी। इसकी स्पीड 4G से भी एक हजार गुना तेज होगी। इसमें वेबपेज की अधिकतम साइज 3.2 जीबी होगी। 4G वायरलेस सर्विसेज में स्पीड 6400 एमबीपीएस तक होगी। इसमें 800 एमबी की मूवी का कुल डाउनलोडिंग टाइम 1 सेकंड लगेगा।

इस प्रकार हम देखते हैं कि टेक्नोलॉजी में बदलाव बहुत शीघ्रता से आ रहे हैं। जहाँ फर्स्ट जनरेशन टेक्नोलॉजी में बात करना भी काफी कठिन था वहीँ फोर्थ जनरेशन में विडियो कालिंग भी इतनी सुगमता से होती है कि ऐसा प्रतीत ही नहीं होता कि बातचीत सामने ना होकर फोन पर हो रही है। अगर तकनीव में बदलाव इसी तेजी से चलता रहा तो वह दिन दूर नहीं जब बिना किसी इंस्ट्रूमेंट के बात करना भी संभव हो जाएगा।

1G से 5G तक बदलती टेक्नोलॉजी का असर Effect of changing technology from 1G to 5G

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