शराब हमारे शरीर के लिए अत्यंत घातक

शराब हमारे शरीर के लिए अत्यंत घातक - शराब, मदिरा, दारू और सुरा एक अल्कोहल युक्त पेय पदार्थ है जिसका प्रमुख घटक एथेनॉल है। यह विभिन्न रूपों में पाई जाती है जैसे रम, चूलईया, व्हिस्की, महुआ, ब्रांडी, जीन, बीयर, हंड़िया, आदि।

किसी में अल्कोहल की मात्रा कम और किसी में अधिक होती है परन्तु अल्कोहल सभी में होता है। शराब पीने से शरीर में एक अजीब सा नशा हो जाता है और कुछ समय के लिए मतिभ्रम होकर मिथ्याभास होने लगता है जिसे तथाकथित आनंद का नाम दे दिया जाता है।

कुछ लोग शराब अपने दुःख दर्दों को भुलाने के लिए पीने का दावा करते हैं, कुछ लोग इसे महज एक शौक के रूप में पीना शुरू करते हैं, कुछ लोग महफिल में रंग जमाने और मूड बनाने के लिए पीते हैं, कुछ लोग इसे अपनी कमजोरी को छुपाने के लिए हथियार के रूप में इस्तेमाल करने के लिए पीते हैं।

अधिकतर यह पाया गया है कि ऐसे लोग सामान्य स्थिति में बहुत दब्बू किस्म के होते हैं और पीने के बाद अपने आप को शेरदिल समझनें लग जाते हैं। यह दब्बूपन शारीरिक ना होकर मानसिक भी हो सकता है।

शराब शिक्षित और अशिक्षित दोनों तरह के लोगों में समान रूप से लोकप्रिय होती है और शाम होते-होते शराब की दुकानों पर इस प्रकार भीड़ जमा होनें लगती है जैसे कि मुफ्त में बाँटी जा रही हो।

बहरहाल पीनेवालों को पीने का बहाना चाहिए। खुशी का मौका हो तो खुशी मनाने के लिए, गम हो तो गम गलत करने के लिए, मौसम बारिश वाला हो तो मौसम का आनंद लेने के लिए, सर्दी में सर्दी कम करने गर्मी लाने के लिए और गर्मी में ठण्ड महसूस करने के लिए, परीक्षाएँ समाप्त हो तो समाप्ति के लिए, परीक्षा में उत्तीर्ण और अनुत्तीर्ण होने वाली दोनों पारिस्थितियों के लिए, जन्मदिन, शादी, शादी की वर्षगाँठ को मनाने के लिए और यहाँ तक की घरवाली के मायके जाने पर भी शराब का बहाना ढूँढ लिया जाता है।

शराब और दवा में बहुत ज्यादा फर्क नहीं होता है परन्तु यह इसकी मात्रा पर निर्भर करता है। अगर शराब को दवा की तरह पिया जाए तो यह कुछ हद तक फायदेमंद होती है और अगर इसे अनियंत्रित मात्रा में पिया जाये तो यह जहर बनकर पीनेवाले को ही समाप्त कर देती है।

शराब की मात्रा को परिभाषित करना बहुत मुश्किल कार्य है क्योंकि इसे किसी भी मात्रा से शुरू करो यह कुछ समय पश्चात नई और अधिक मात्रा की मांग करती है।

धीरे धीरे शरीर इस पर निर्भर होने लग जाता है और जितनी भी शराब पीओ कम लगने लग जाती है। शराब का सबसे बड़ा दुर्गुण यही है कि शरीर को इसकी लत लग जाती है और शरीर इसपर निर्भर होने लग जाता है।

इस लत को पूरा करने के लिए व्यक्ति कुछ भी कर गुजरनें को तैयार हो जाता है। शराब के नशे में व्यक्ति अपने परिवार को भूल जाता है और कई बार ऐसे कार्य कर बैठता है कि जब उसे होश आता है तब पछतावे की आग में जलकर मर जाता है।

शराब की वजह से सबसे पहले लीवर खराब हो जाता है जिसे फैटी लीवर कहा जाता है, फिर धीरे-धीरे किडनियाँ काम करना बंद कर देती है।

व्यक्ति उच्च रक्तचाप, एसिडिटी, अपच, याददाश्त में कमी, नपुंसकता आदि समस्याओं से भी जूझनें लगता है। शराब ही ऐसा नशा है जिसे रात को पीने के बाद सुबह इसके खुमार (हैंगओवर) को कम करने के लिए पुनः पीना पड़ता है।

कई लोग अति-आत्मविश्वास में कहते हैं कि हम बहुत निर्धारित सीमा में शराब पीते हैं तथा हमें इसका कोई नुकसान नहीं होगा परन्तु उनमे से अधिकतर का आत्मविश्वास बहुत जल्दी उड़न छू हो जाता है।

भारत वैसे भी गर्म प्रदेश है और यहाँ पर शराब पीना अपनी मौत को बुलावा देने के समान है। यह मुख्य रूप से ठन्डे प्रदेशों का पेय पदार्थ है जिसको की हमने विदेशियों से सीखा है।

अमीर और गरीब अपनी-अपनी हैसियत के अनुसार शराब पीते है। अमीर आदमी महँगी विदेशी शराब पीते हैं तथा गरीब आदमी सस्ती और देशी शराब पीते हैं।

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देशी शराब में कई बार मिलावट करके मेथनॉल मिला दिया जाता है जिसकी वजह से लोग अंधे हो जाते हैं और बहुत बार मृत्यु को प्राप्त हो जाते हैं।

अतः शराब एक सामाजिक बुराई है जिसकी वजह से जनधन की हानि के साथ-साथ घर के घर तबाह हो जाते हैं।

अगर शराब एक सामाजिक बुराई नहीं है तो फिर इसे छुप छुपकर ही क्यों पिया जाता है? अपने पत्नी और बच्चों को इससे दूर क्यों रखा जाता है? हम इसे अपनी पत्नी और बच्चों के साथ घर में क्यों नहीं पी सकते हैं?

हमारे धार्मिक धारावाहिकों और फिल्मों में दिखाया जाता है कि इन्द्र देवता की सभा में सुन्दर अप्सराएँ सोमरस का वितरण करती हैं व सभी देव सोमपान करते थे।

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इस दृश्य की वजह से कई लोग इसे सुरापान से जोड़कर यह समझानें लग गए कि यह तो हमारी संस्कृति का हिस्सा है और जो कार्य देवता करते थे वह कार्य उचित है।

बहुत से लोग शराब की तुलना प्राचीन भारत में प्रचलित सोमरस से करके अपने शराब पीने को जायज ठहराने की कोशिश करते हैं। इस सोमरस को शराब बताकर इसे पीनें की वकालत भी होती रहती है।

परन्तु हमें यह अच्छी तरह से ज्ञात होना चाहिए कि हमारे धर्म ग्रन्थों में जिस सोमरस की बात की गई है वह कतई शराब नहीं थी।

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सोमरस एक प्रकार का औषधीय गुणों से भरपूर पेय पदार्थ था जो की दूध और दही मिश्रित होता था। इसमें सोम नामक लता का अंश एक प्रमुख घटक के रूप में होता था।

यह सोमरस आयुर्वेदिक औषधि का एक रूप था जो शरीर के शांत पित्त को बढ़ानें का काम करता था जिसकी वजह से भूख ज्यादा लगती थी।

अतः हम शराब पीते हैं तो इसे त्यागनें का तथा अगर नहीं पीते है तो इसे नहीं पीनें का संकल्प लेना चाहिए।

शराब हमारे शरीर के लिए अत्यंत घातक Alcohol is extremely dangerous for our body

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