पाश्चात्य जीवनशैली का बढ़ता दुष्प्रभाव अत्यंत घातक

पाश्चात्य जीवनशैली का बढ़ता दुष्प्रभाव अत्यंत घातक - बदलते वक्त के साथ-साथ इंसान की जीवनचर्या भी बदलती जा रही है। जिस दिनचर्या को पुराने समय में सही नहीं माना जाता था वह दिनचर्या अब स्वीकार की जाने लगी है।

बहुत कुछ इंसान से छूटता जा रहा है तथा इंसान प्रगति, वैभव के प्रदर्शन और आरामतलबी में दिन प्रतिदिन आलसी होता जा रहा है।

दिन–प्रतिदिन उन्नत होती जा रही टेक्नोलॉजी ने जीवन को इतना आसान बना दिया है कि जिन कार्यों के लिए पुराने समय में शारीरिक श्रम आवश्यक था उन कार्यों को भी बिस्तर पर लेटे-लेटे या आराम कुर्सी पर बैठे-बैठे संपन्न किया जा रहा है।

मनुष्य के आलसी तथा आराम पसंद होने का परम उदहारण यह है कि वह अपनी नित्य क्रियाओं को भी बड़े आराम तथा आलस के साथ ही संपन्न करना चाहता है तथा तकनीक ने इसे अत्यंत आसान बना भी दिया है।

पुराने समय में जिस शौचालय को मनुष्य अपने घर में कहीं पर भी देखना नहीं चाहता था, वर्तमान समय में वह मनुष्य के शयन कक्ष में होना अत्यावश्यक समझा जाने लगा है।

शौचालय भी पूरी आरामगाह हो गया है जिसमे शौच भी पूरी आराम की मुद्रा में किया जाता है। हमारी शौच करने की परंपरागत मुद्रा का लोप हो गया है।

कहने को मनुष्य के पास ढंग से शौच क्रिया करने का समय भी नहीं है, शौच में लगने वाला समय उसे व्यर्थ लगने लगा है तथा वह शौच क्रिया के समय को भी अन्य कार्य करके उपयोग में लेना चाहता है।

बदलते समय में मनुष्य की आदतों में सबसे बड़ा बदलाव रात में देर से सोना तथा सुबह देर से उठना है। लोग सारी-सारी रात जागते हैं तथा फिर दोपहर तक सोते हैं तथा तर्क में इसी का नाम ही जन्दगी बताते हैं।

बहुत से घरों का तो यह आलम है कि उनकी सुबह ही दिन में ग्यारह-बारह बजे के बाद होती है। सुबह जल्दी उठने वाले को अन्य सोने वालों की नाराजगी झेलनी पड़ती है।

एक समय वो था जब जल्दी उठना अच्छा माना जाता था और एक समय आज का है जब जल्दी उठना नींद खराब करना समझा जाता है। हमें यह समझना होगा कि निद्रा एक प्रकार की क्षणिक मृत्यु है तथा यह मृत्यु के समान अत्यंत गहन होनी चाहिए तभी हमारा शरीर तथा दिमाग तन्दुरुस्त रहते हैं।

हजारों-लाखों वर्षों से भारत में लोग ब्रह्म मुहूर्त के समय उठते आये हैं। ब्रह्म मुहूर्त का समय प्रातः चार बजे के आसपास का होता है भारतीय पुराणों तथा प्राचीन मान्यताओं के अनुसार ब्रह्म मुहूर्त का समय अध्ययन तथा अध्यात्म के लिए श्रेष्ठ होता है।

इस समय किया गया अध्ययन तथा पूजा पाठ दोनों ही काफी लाभकारी एवं फलदायक माने जाते हैं। बदलते समय में ऐसे खुशनसीब लोग कम ही हैं जो ब्रह्म मुहूर्त का महत्त्व समझते हैं।

लोग सूर्योदय का मतलब किताबों में पढ़ते हैं या फिर सूर्योदय विडियो में देखते हैं। सूरज ऊर्जा का प्रतीक है तथा इसकी पहली किरण हमारे अंग-अंग में जोश तथा उमंग का संचार करती है। बदनसीब है वे लोग जो इस दैवीय समय को क्षणिक मौत में गवा रहे हैं।

सूर्योदय के समय हमारे मस्तिष्क में नई ऊर्जा का संचार होता है तथा जीवन के प्रति हमारा नजरिया बहुत सकारात्मक होता है। यह नजरिया रात्रि तक बहुत बदल जाता है।

मनुष्य के खान-पान में भी सम्पूर्ण रूप से बदलाव हो गया है। परंपरागत भोजन की जगह अब जंक तथा प्रोसेस्ड फूड लेता जा रहा है। पिज्जा, बर्गर, हॉट डॉग, पेटीज, कोल्ड ड्रिंक, कॉफी, चाय आदि को आधुनिकता का पैमाना समझा जाने लगा है।

बहुराष्ट्रीय कंपनिया अपने हितार्थ नित नई रिसर्च पेश कर अधिक से अधिक मुनाफा कमाने में लगी हुई है। मार्केटिंग तथा ब्रांडिंग ने इंसानी दिमाग को गुलाम बना लिया है। हम उन सभी बातों को ही सही मानने लग गए हैं जो हमारे दिमाग में साजिशपूर्ण तरीके से भरी जा रही है।

यह बड़े दुर्भाग्य की बात है कि हम भारतीय लोग पूर्णरूपेण पाश्चात्य संस्कृति के प्रभाव में डूब चुके हैं। हम मेहनतकश जीवन को छोड़कर आरामतलब जीवन की तरफ बढ़ रहे हैं।

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हमें यह अच्छी तरह से समझना होगा कि मनुष्य जितना प्राकृतिक जीवन जियेगा वह उतना ही अधिक स्वस्थ रहेगा।

आखिर ऐसे क्या कारण हैं कि हम ऋषि-मुनियों द्वारा वैज्ञानिक ढंग से विकसित भारतीय जीवन शैली को त्याग कर पाश्चात्य जीवन को अपना रहे हैं? हम क्यों दुनिया की सबसे पुरानी सभ्यता तथा संस्कृति को त्याग रहे हैं?

इसका उत्तर शायद हमारी गुलाम मानसिकता है जो विदेशियों से बहुत प्रभावित है। हम अंग्रेजों की गुलामी कर-करके अपने आप को भी अंग्रेज समझ बैठे हैं।

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शायद लार्ड मैकाले की शिक्षा पद्धति भारतीयों को मानसिक गुलाम बनाने में सफल हो गई है। हमारे देश में भी अधिकतर लोग काली चमड़ी वाले अंग्रेज हो गए हैं जो शक्ल से भारतीय तथा मानसिकता से अंग्रेज हैं।

हमें यह समझना होगा कि हम उस गौरवशाली देश तथा विभूतियों के वंशज हैं जिन्होंने दुनिया को उस समय सभ्यता से रहना सिखाया था जब ये पाश्चात्य संस्कृति जन्मी भी नहीं थी।

शिक्षा तथा स्वास्थ्य में भारत का परचम हजारों वर्षों से रहा है। हजारों वर्षों से तक्षशिला तथा नालंदा जैसे विश्वविद्यालय शिक्षा की अलख जगाते रहे हैं।

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महर्षि पतंजलि तथा सुश्रुत जैसे तपस्वियों ने स्वास्थ्य के क्षेत्र में दुनिया को उस समय वो सब कुछ सिखाया जब उन देशों में सभ्यता का जन्म भी नहीं हुआ था जिनका हम आज अनुकरण कर रहे हैं।

भारतीय सभ्यता का मनुष्य के लिए एक ही सन्देश है कि अधिक से अधिक प्राकृतिक जीवन जिओ। जितना हम प्रकृति के नजदीक रहेंगे उतना अधिक स्वस्थ रहेंगे।

अगर हम आरामतलब संस्कृतियों का अनुकरण करके आरामतलब होते जाएँगे तब हमें भी इस आरामतलबी के परिणाम भोगने पड़ेंगे।

पाश्चात्य जीवनशैली का बढ़ता दुष्प्रभाव अत्यंत घातक Increasing side effects of western lifestyle

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