मैनेजमेंट का बेहतरीन उदाहरण है मोदी और शाह की रणनीति

मैनेजमेंट का बेहतरीन उदाहरण है मोदी और शाह की रणनीति - भारतीय जनता पार्टी के लिए प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी तथा गृहमंत्री एवं भाजपा अध्यक्ष अमित शाह की जोड़ी सफलता का पर्याय बन गई है.

इस जोड़ी की कार्यशैली परंपरागत कार्यशैली से एकदम भिन्न रही है. शायद इसी नयेपन के कारण यह जोड़ी अजेय सफलता भी प्राप्त कर रही है.

दरअसल नयापन ताजगी लाता है, नयापन रुचि पैदा करता है, जिसकी वजह से लोग आप से जुड़ने लग जाते हैं. जबकि पुरानी चीजें बोरियत पैदा करती हैं और खासकर अगर राजनीति की अगर बात की जाये तो जनता बहुत समय से पुराने वादों और कार्यशैली से ऊब चुकी थी तथा कुछ नया चाहती थी.

जनता के मन की इसी भावना को मोदी-शाह की जोड़ी ने पहचाना और जनमानस के अनुरूप ही अपने चुनाव प्रचार का प्रारंभ किया. इन्होंने राजनीति में उन तरीकों का इस्तेमाल किया जिन तरीकों से विपक्षी दल आज भी कोसों दूर हैं. इनकी सफलता का प्रमुख मंत्र एक ही रहा है और वो है जनमानस के हिसाब से अपनी मार्केटिंग और मैनेजमेंट.

चूंकि भारत युवाओं का देश है तथा यहाँ का अधिकतर वोटर युवा है. युवा अपने देश का प्रतिनिधित्व उस नेता के हाथ में सौपना चाहते हैं जो प्रधानमंत्री पद पर आसीन होकर सिर्फ प्रोटोकॉल में ना बंध जाएँ. इन्हें रॉक स्टार प्रधानमन्त्री चाहिए जो हर मंच पर एक विश्वनेता की तरह अपना तथा अपने देश का प्रतिनिधित्व करे.

प्रधानमन्त्री युवाओं की इस आकांक्षा पर खरे उतरे हैं. जिस प्रकार अमेरिकन राष्ट्रपति युवाओं से बड़े स्टेज के माध्यम से रूबरू होते हैं, नरेन्द्र मोदी ने भी ठीक उसी प्रकार की गतिविधियों को अंजाम दिया. जब भी ये कहीं विदेश यात्रा पर जाते है तो वहाँ प्रवासी भारतीयों से ये इसी प्रकार एक रॉक स्टार की भाँति बहुत गर्मजोशी से मिलते हैं.

प्रवासी भारतीय समुदाय अपने वतन के नुमाइंदे को अपने बीच पाकर अभिभूत हो उठता है जिसकी वजह से विदेशों में भी मोदी–मोदी के नारे लगने लग जाते हैं. हमारे पूर्व प्रधानमंत्रियों ने प्रवासी भारतीयों से मोदी की तरह कभी मुलाकात ही नहीं की.

युवावर्ग सोशल मीडिया जैसे फेसबुक, ट्विटर, इन्स्टाग्राम, यू ट्यूब, व्हाट्स एप आदि प्लेटफार्म पर बहुज ज्यादा एक्टिव है. आज के समय में सोशल मीडिया अन्य सभी प्रकार के मीडिया पर बहुत भारी पड़ गया है. मोदी-शाह की जोड़ी ने इस सोशल मीडिया की ताकत को पहचानकर इसे अपने प्रचार का प्रमुख माध्यम बनाया.

इसी सोशल मीडिया के जरिये मोदी अपनी बात को युवाओं तक प्रभावी तरीके से रख पाए. इन्होंने पूरे देश में अपनी पार्टी की आईटी सेल गठित कर उसे सोशल मीडिया पर अपनी बात रखने के लिए तैयार किया जबकि विपक्षी पार्टियाँ आज भी सोशल मीडिया पर एक्टिविटी के मामले में बहुत पीछे है.

मार्केटिंग का सबसे मूलमंत्र यही है कि जो दिखता है वो ही बिकता है. ढंग से मार्केटिंग करके मिट्टी को भी बेचा जा सकता है और बिना मार्केटिंग के सोने को बेच पाना भी मुश्किल हो जाता है. इन्होंने इन्ही बातों को ध्यान में रखकर ऐसी रणनीति बनाई जिसकी वजह से भारत में पहली बार राजनीति में मार्केटिंग का इतना अधिक महत्त्व बना.

ऐसा नहीं है कि राजनितिक दल पहले राजनीति में मार्केटिंग का इस्तेमाल नहीं करते थे परन्तु उनकी सोच सिर्फ परंपरागत तरीकों जैसे अखबार, दूरदर्शन, रेडियो आदि तक ही सीमित रही. मोदी-शाह की जोड़ी ने भारत का शायद ऐसा कोई माध्यम छोड़ा होगा जहाँ इनकी मार्केटिंग नहीं हुई हो.

यहाँ तक की आम चुनाव से ठीक पहले “नमों” नामक एक टीवी चैनल भी लॉन्च हुआ तथा चुनाव की समाप्ति के पश्चात गायब भी हो गया. मार्केटिंग के लिए इन्होंने इतने नवीन तरीके इस्तेमाल किये जिनके बारे में विपक्ष अभी तक भी तैयार नहीं हुआ.

मार्केटिंग का एक सिद्धांत यह भी है जब कि जब आपका प्रोडक्ट तुलनात्मक रूप से अच्छा हो तब आप उसकी मार्केटिंग बहुत अच्छी कर पाते हैं. इस जोड़ी ने तुलनात्मक मार्केटिंग को भी अंजाम देते हुए यह चुनावी मुकाबला नरेन्द्र मोदी एवं राहुल गाँधी के मध्य प्रचारित कर दिया. तुलनात्मक रूप से लोगों ने नरेन्द्र मोदी को राहुल गाँधी से अधिक तरजीह दी.

मोदी जब अपने घर जाकर अपनी माताजी से मिलते है तब भी कैमरे के माध्यम से अपने वोटरों को साध रहे होते हैं. ये अपने कार्य को इस प्रकार से अंजाम देते हैं कि सांप भी मर जाये और लाठी भी ना टूटे.

इसका एक उदाहरण यह है कि जब पाँचवे चरण का चुनाव प्रचार समाप्त हो गया तब ये केदारनाथ, बद्रीनाथ की यात्रा पर निकल गए एवं वहाँ गुफा में साधना की.

इस घटना ने मीडिया को अपनी और खींचा और मोदी पूरे दिन खबरों के माध्यम से मीडिया में छाये रहे. चुनाव प्रचार बंद होने के पश्चात भी इनका चुनाव प्रचार अपने आप होता रहा. यह नवीन युक्ति सिर्फ यह जोड़ी ही सोच सकती थी अन्य दलों को तो समझ में ही नहीं आया कि हुआ क्या.

इस जोड़ी ने युवाओं के साथ-साथ आम जन में राष्ट्रवाद की ऐसी भावना पैदा कर दी कि लोग जातीय समीकरणों को त्यागकर भारत के लिए मतदान करने निकले. ऐसा प्रतीत होता था कि यह चुनाव देश के लिए हो रहा है जिसमे स्थानीय मुद्दे समाप्त हो चुके थे.

सर्जिकल स्ट्राइक तथा बालाकोट एयर स्ट्राइक को अंजाम देने से यह राष्ट्रवाद चरम पर पहुँच गया जिसकी परिणिति स्वरुप भाजपा को ऐतिहासिक जीत हासिल हुई.

लोगों ने अपने क्षेत्र के उम्मीद्वार को नहीं देखा, देखा तो सिर्फ मोदी को, और मोदी के ही नाम पर पूरे देश में भाजपा को वोट मिले. इस चुनाव में ऐसे-ऐसे उमीदवार मोदी के नाम पर विजय प्राप्त कर गए जिनकी निजी पहचान बहुत ही कम रही है.

नरेन्द्र मोदी की साफ छवि ने भी उनकी मार्केटिंग स्ट्रेटेजी में बहुत बड़ा योगदान दिया है. इनकी ये एक बहुत बड़ी खासियत है कि विपक्ष इनपर जो हमला करता है उसे ये अपना हथियार बना लेते हैं.

राहुल गाँधी ने “चौकीदार चोर है” का नारा दिया जिसे भी इन्होंने “मैं हूँ चौकीदार” अभियान चलाकर फुस्स कर दिया. राहुल गाँधी बहुत प्रयास करके भी नरेन्द्र मोदी पर दाग नहीं लगा पाए.

आज नरेन्द्र मोदी भारत के सबसे प्रभावशाली वक्ता हैं जिसे कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गाँधी भी स्वीकार करते हैं. मोदी जब बोलते हैं तो इनका जुडाव सीधे जनता के दिलों से होता है. ये जनमानस से जुडी रोजमर्रा की बातों को भी इस प्रकार प्रस्तुत करते हैं कि उसे सुनने को दिल करता है.

लोगों को ऐसा लगता है कि ये उनके बारे में ही बात कर रहे हैं. इनका भाषण सुनने के पश्चात इनसे लगाव हुए बिना नहीं रह सकता.

मोदी की छवि को एक हिन्दुत्ववादी नेता के रूप में गढ़ा गया है जिसकी वजह से बहुसंख्यक हिन्दू वर्ग ने इन्हें दिल खोलकर समर्थन दिया है. इन चुनावों में हिन्दू वोटर लामबंद हो गया है.

हिन्दुओं के लामबंद होने में बहुत बड़ा योगदान कांग्रेस की मुस्लिम तुष्टिकरण वाली नीतियाँ भी रही है. चुनावों के माध्यम से ऐसा संकेत भी बहुसंख्यक वर्ग में गया है कि कांग्रेस मुस्लिम तुष्टिकरण करती है.

हालांकि नरेन्द्र मोदी हमेशा सबको साथ लेकर चलने की बात करते हैं तथा हमेशा सवा सौ करोड़ भारतवासियों की ही बात करते हैं. सवा सौ करोड़ भारतवासियों में हिन्दू, मुस्लिम, सिख इसाई सभी लोग आ जाते हैं.

मेहनत के साथ मार्केटिंग हो तो विजय सुनिश्चित होती है. नरेन्द्र मोदी और अमित शाह दोनों बहुत मेहनती हैं. अल्प समय में जनमानस के दिलों दिमाग पर छा जाना सिर्फ मार्केटिंग पर ही निर्भर नहीं करता बल्कि ये आपकी मेहनत को भी दर्शाता है. सम्पूर्ण देश में चुनावी रैलियां करना तथा पार्टी के संघटन को एकजुट रखना, अत्यंत कठिन कार्य है.

जिस प्रकार चन्द्रगुप्त और चाणक्य ने रणनीति बनाकर भारत का नेतृत्व किया था मोदी-शाह की जोड़ी भी उसी दिशा में अग्रसर दिखाई दे रही है. पूर्ण बहुमत प्राप्त करने के पश्चात कश्मीर समस्या, राम मंदिर, अर्थव्यवस्था, महंगाई, रोजगार आदि कुछ ऐसी समस्याएँ हैं जिनका निराकरण बहुत जरूरी है.

उम्मीद है कि मोदी के नेतृत्व में भारत भूमि पर फिर से राम राज्य आएगा एवं भारत फिर से सोने की चिड़िया बन सकेगा.

मैनेजमेंट का बेहतरीन उदाहरण है मोदी और शाह की रणनीति Strategy of Modi and Shah is best example of management

Written by:
Ramesh Sharma

ramesh sharma smpr news

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