विफल खेल-तंत्र को दुरुस्त करने की जरुरत

विफल खेल-तंत्र को दुरुस्त करने की जरुरत - विश्व के विभिन्न राष्ट्रों के विकास के लिए आवश्यक तत्वों के पैमाने भिन्न-भिन्न हैं, लेकिन इस विकास-स्पर्धा में कुछ तत्व ऐसे भी हैं, जिन पर सभी देशों में आम सहमति भी है.

इसी कड़ी में, यदि हम ‘खेल’ को किसी भी राष्ट्र की प्रगति में एक अपरिहार्य कारक मानें तो इसमें कोई अतिशयोक्ति नहीं होगी, और अगर बात भारत की हो तो इस तथ्य के मायने कहीं ज्यादा बढ़ जाते हैं.

विफल खेल-तंत्र को दुरुस्त करने की जरुरत

खेलों के लिए भारतीयों की दीवानगी किसी से भी नही छुपी है. माना जाता हैं कि हमारे देश में लोग ‘खेल’ को ‘धर्म’ के समकक्ष रखते हैं. हाँ, वो अलग बात है कि आमजन ने अपनी रूचि और प्राथमिकता के हिसाब से खेलों का वरीयता-क्रम तय कर रखा है.

भारतीयों में खेलों के प्रति इस पागलपन का मुख्य कारण, ऐतिहासिक दृष्टि से भारत का विभिन्न खेलों में सराहनीय प्रदर्शन है. 20वीं शताब्दी, जो कि भारतीय खेलों का स्वर्णिम दौर था, में हमारा अनेक अन्तर्राष्ट्रीय प्रतियोगिताओं में बेहतरीन प्रदर्शन इसकी पुष्टि करता है.

उदाहरण हेतु, भारतीय हॉकी टीम ने वर्ष 1920 से वर्ष 1980 तक संपन्न हुए 12 ओलम्पिक खेलों में हॉकी में 11 पदक जीते जिनमें वर्ष 1928 से वर्ष 1956 तक जीते हुए लगातार 6 स्वर्ण पदक शामिल हैं. इसके अलावा, इसी दौर में आयोजित हुए, एशियाई व राष्ट्रमंडल खेलों में भारत का प्रदर्शन काबिल-ए-तारीफ रहा.

तत्पश्चात, नवीन तकनीक व प्रौद्योगिकी के विकास व बढ़ते उपयोग के साथ ही ये उम्मीद बढ़ी कि 21वीं सदी में भारत खेल के क्षेत्र में नई ऊँचाईयों को छुएगा, लेकिन दुर्भाग्यवश ऐसा ना हो सका. हमें सफलता मिली, लेकिन ऐसी नहीं कि जो गौरवान्वित कर सके, जो हमें अन्य देशों के बराबर में खड़ा कर सके.

इस विफलता के पीछे, सम्पूर्ण खेल-तंत्र का पटरी पर से उतर जाना, मुख्य कारण रहा. भारतीय खेल व युवा विभाग मंत्रालय की वेबसाइट के अनुसार, वर्तमान में देश में 56 मान्यता प्राप्त खेल संघ अस्तित्व में हैं. इन खेल संघों में व्यापक स्तर पर अनियमितताएँ मौजूद है.

संघों में नियत समय पर कार्यकारिणी व पदाधिकारियों का गठन ना तो होता है, अगर इन संस्थाओं में चुनाव संपन्न भी होते हैं, तो पूरी चुनावी प्रकिया एवं संदेह के घेरे में आकर न्यायालय में लंबित पड़ी रहती है और येन-केन-प्रकारेण सब कुछ पूरी तरह से सही होता है, जिसकी सम्भावना कम ही रहती है.

संघ/संस्था के अध्यक्ष/उपाध्यक्ष/सचिव/कोषाध्यक्ष जैसे अहम पदों की कुर्सी पर राजनेता विराजमान मिलते हैं जो कि इस अव्यवस्था का सबसे बड़ा नकारात्मक बिंदु है.

इस पूरे तंत्र की विफलता, बाद में ‘इन्फ्रास्ट्रक्चर की कमी’, ‘खिलाडियों के चयन व फिटनेस’ जैसे बहाने ढूँढती है और खुद को प्रतियोगिता में मिली असफलता के बाद हुई ‘तथाकथित समीक्षा-प्रकिया’ से अलग कर लेती है. ये किसी गंभीर मजाक या विडंबना से कम नहीं है.

आए साल ‘खेल दिवस’ पर आयोजित होने वालों कार्यक्रमों के अध्यक्षीय उद्बोधन के केंद्र में केवल ‘जीवन में खेलों का महत्व’ और ‘ओलंपिक खेल’ ही रहते हैं. सम्पूर्ण खेल-तंत्र और संघों की व्यापक असफलता पर उद्बोधन की बात आते ही सभी माननीयों को जैसे ‘साँप सूंघ’ सा जाता है.

स्थिति बड़ी गंभीर है. सरकार को चाहिए कि वह जल्द ही इस समस्या को दूर करें, समस्या के निराकरण में सर्वोच्च न्यायालय, पूर्व खिलाड़ी, वरिष्ठ खेल पत्रकारों का सहयोग अपेक्षित है. ये सभी एक कड़ी बनकर सामने आ सकते हैं.

इस मामले में माननीय सर्वोच्च न्यायालय की ‘हितों के टकराव’ (ऑफिस ऑफ़ प्रॉफिट) वाली टिप्पणी भी कारगर साबित हो सकती है. उम्मीद है कि खेल जैसे ‘संवेदनशील’ विषय में ये ‘असंवेदनशीलता’ जल्द ही दूर होगी.

विफल खेल-तंत्र को दुरुस्त करने की जरुरत Failed sports system need to fix

Written by:

Keshav Sharma
Rajasthan university

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