श्रीमाधोपुर के लिए सरकारी महाविद्यालय प्रमुख जरूरत

श्रीमाधोपुर के लिए सरकारी महाविद्यालय प्रमुख जरूरत - शिक्षा तथा स्वास्थ्य दोनों ही समाज की प्रमुख आवश्यकताएँ हैं परन्तु अगर इनमे से भी प्राथमिकता की दृष्टि से देखा जाए तो शिक्षा का स्थान सर्वोपरि होता है। शिक्षा ही मानव का वह गुण है जो उसे पशुओं से भिन्न बनाता है।

श्रीमाधोपुर के लिए सरकारी महाविद्यालय प्रमुख जरूरत

शिक्षा ही वह ब्रह्मास्त्र है जो अज्ञान रुपी दानव का वध करने के लिए काम आता है। शिक्षा ही वह प्रकाश है जो अज्ञान के अन्धकार को समाप्त कर चहुँ ओर ज्ञान का उजाला फैलाती है। शिक्षा ही स्वास्थ्य की कुंजी है तथा शिक्षित व्यक्ति अपने तथा अन्य लोगों के स्वास्थ्य के प्रति सजग होता है।

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शिक्षा को देवी सरस्वती का रूप माना गया है जिसका मतलब शिक्षा ईश्वर का रूप है तथा शिक्षार्जन ईश्वर की इबादत करने के समान है। जो लोग शिक्षा के क्षेत्र में निशुल्क तथा निस्वार्थ भाव से अपना सहयोग प्रदान करते हैं वो लोग एक तरह से ईश्वर की इबादत में अपना योगदान करते है।

यहाँ प्रमुख बात यह है कि शिक्षा प्रदान करने का इरादा क्या है, क्या यह येन केन प्रकारेण धनार्जन का विकल्प तो नहीं बनता जा रहा है? जब से शिक्षा के क्षेत्र में व्यापारियों का प्रवेश हुआ है तब से इसका भी व्यवसायीकरण हो गया है।

श्रीमाधोपुर के लिए सरकारी महाविद्यालय प्रमुख जरूरत

शिक्षा समाज को सभ्य तथा सुसंस्कृत बनाती है। शिक्षित होना हर नागरिक का हक होता है। एक चुनी हुई लोकतान्त्रिक सरकार की भी यह जिम्मेदारी बनती है कि वह अपने नागरिकों के लिए अच्छी शिक्षा का समुचित रूप से प्रबंध करे।

परन्तु ऐसा लगता है कि सरकारें तथा समाज इस दिशा में काफी उदासीन भी होते हैं, इस बात का जीता जागता उदाहरण है श्रीमाधोपुर कस्बा तथा इसके आस पास का क्षेत्र।

श्रीमाधोपुर तथा इसके आस पास की लगभग 25 किलोमीटर की परिधि की अगर बात की जाए तो इसमें श्रीमाधोपुर के साथ-साथ खंडेला, रींगस, अजीतगढ़, कांवट, मूंडरू, मऊ, लिसाडिया, दिवराला, महरोली, जाजोद, खाटूश्यामजी, रलावता सहित अनेक गाँव तथा कस्बे आते हैं।

सामूहिक रूप से अगर बात की जाए तो इन सभी को मिलाकर इस कुल क्षेत्र की जनसंख्या लगभग दो से तीन लाख के आस पास होगी।

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यह बड़े आश्चर्य की बात है कि आजादी से लेकर आज तक इतनी बड़ी जनसंख्या वाले क्षेत्र के लिए एक भी सरकारी कॉलेज नहीं है।

क्या श्रीमाधोपुर वासियों को आज तक इसकी जरूरत ही महसूस नहीं हुई या फिर इस क्षेत्र के राजनेताओं ने भी इस दिशा में पूरी तरह से अकर्मण्य रुख अपना रखा है? क्या श्रीमाधोपुर क्षेत्र के लोग अपने बच्चों को मोटा शुल्क चुकाकर निजी महाविद्यालयों में पढ़ाकर प्रसन्न हैं?

निश्चित रूप से यह जनता में जागरूकता की कमी की वजह से हो रहा है या फिर वह इस मिथ्या धारणा से ग्रसित है कि सरकारी महाविद्यालय होने की वजह से उन्हें कई प्रकार की परेशानियों का सामना करना पड़ेगा।

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कारण चाहे कुछ भी हो परन्तु यह तय है कि सरकारी महाविद्यालय के ना होने से हर वर्ष बहुत से गरीब तथा असक्षम लोगों के बच्चे शिक्षा पाने से वंचित रह जाते हैं।

सरकारी महाविद्यालय ना होने से सक्षम लोगों को तो कोई फर्क नहीं पड़ता है क्योंकि ये लोग अपने बच्चों को या तो मोटा शुल्क चुकाकर निजी महाविद्यालय में प्रवेश दिला देते हैं या फिर किसी बड़े शहर जैसे जयपुर, सीकर आदि के किसी महाविद्यालय में प्रवेश दिला देते हैं।

अमूमन पैसे वाला कोई मांग भी नहीं रखता है। परन्तु गरीब आदमी के सामने अपने बच्चों को अशिक्षित रखने के अतिरिक्त कोई अन्य विकल्प नहीं रह जाता है।

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गरीब आदमी अपने बच्चों को ना तो निजी महाविद्यालय की मोटी फीस चुकाकर पढ़ा सकता है और ना ही वह उन्हें किसी अन्य शहर में भेजकर उनका खर्च वहन कर सकता है। सामाजिक विषमता का आलम यह है कि गरीब और अधिक गरीब हो रहा है तथा अमीर और अधिक अमीर हो रहा है।

अब तो यहाँ तक भी समझा जाने लगा है कि हमारे देश के दो रूप हैं जिनमे भारत गरीबों का देश है और इंडिया अमीरों का देश है। यह शत प्रतिशत सत्य है कि श्रीमाधोपुर तथा उसके आस पास का सम्पूर्ण क्षेत्र भारत में ही आता है, इंडिया में नहीं।

अमूमन यह देखा गया है कि श्रीमाधोपुर क्षेत्र के राजनेताओं ने भी इस दिशा में कोई ध्यान नहीं दिया है। इन्होने सरकारी महाविद्यालय का मुद्दा न तो खुद ने कभी उठाया है और न ही इस दिशा में कोई प्रयास किया है। इस बात से साफ-साफ प्रतीत होता है कि सरकारी महाविद्यालय का मुद्दा कभी भी राजनेताओं की प्राथमिकता में नहीं रहा है।

क्षेत्र की जनता ने दोनों बड़े दलों के नेताओं को अधिकतर एकांतर क्रम से चुना है जिससे शायद यह भ्रान्ति बन गई है कि यह क्रम शाश्वत हो गया है। शायद इसी लिए जनता के मुद्दों में प्राथमिकता का अभाव महसूस किया जाता है।

जो कार्य कोई नहीं करवा सकता है वह कार्य छात्र शक्ति करवा सकती है। छात्र शक्ति ही युवा शक्ति का पर्याय होती है। युवा वर्ग देश का कर्णधार होता है तथा वह अपने अधिकारों के प्रति काफी सजग भी है।

छात्र अब जागरूक हो रहे हैं तथा अपने अधिकारों को समझ रहे हैं। छात्र शिक्षा के महत्त्व को भी समझ रहे हैं तथा वे यह भी समझ रहे हैं कि शिक्षा समाज का अधिकार है।

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छात्रों ने एक बात को भली भाँती समझ लिया है कि किसी भी चीज को पाने के उसकी लोकतान्त्रिक दायरे में रहकर मांग करना जरूरी है क्योंकि बिना मांगे तो नवजात शिशु को उसकी जननी भी दुग्धपान नहीं करवाती है।

इसका मतलब यह कदापि नहीं है कि माता को शिशु की फिक्र नहीं होती है बल्कि इस बात का यह आशय है कि कुछ पाने के लिए उसकी मांग कर यह जताना आवश्यक होता है कि मांगी गई चीज बहुत आवश्यक है।

क्षेत्र के छात्र तथा विभिन्न छात्र संगठन सरकारी महाविद्यालय की मांग को निरंतर अनेक मंचों पर रख रहे हैं। अगर सभी इसी प्रकार से अपनी इस मांग पर डटे रहे तो निश्चित ही बहुत शीघ्र इस क्षेत्र को अपना सरकारी महाविद्यालय मिल जाएगा क्योंकि छात्र शक्ति के समक्ष बहुत सी मांगो को पूर्ण होता देखा गया है।

यह प्रत्येक क्षेत्रवासियों का कर्तव्य बनता है कि वे सरकारी महाविद्यालय की मांग को सरकार के सम्मुख प्रमुखता से उठाएँ तथा जो कोई भी सरकारी महाविद्यालय के लिए प्रयासरत है उसे अपना सक्रिय सहयोग प्रदान करे।

क्षेत्र के राजनेताओं को भी अपने आपसी तथा दलगत मतभेद भुलाकर क्षेत्र में सरकारी महाविद्यालय खुलवाने के लिए प्रयासरत हो जाना चाहिए। सरकारी महाविद्यालय के खुलने से क्षेत्र के लाखों क्षेत्रवासी तथा हजारों विद्यार्थी लाभान्वित होंगे।


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Written by:
Ramesh Sharma

ramesh chandra sharma

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