भारत को महात्मा गाँधी की पुनः जरूरत

भारत को महात्मा गाँधी की पुनः जरूरत - “आने वाली नस्लें शायद मुश्किल से ही विश्वास करेंगी कि हाड़-माँस से बना हुआ कोई ऐसा व्यक्ति भी धरती पर चलता-फिरता था”, दुनिया के महानतम वैज्ञानिकों में से एक माने जाने वाले वैज्ञानिक अल्बर्ट आइन्संटीन का यह कथन भारतीय स्वंतत्रता संग्राम के मुख्य सूत्रधार बने ‘राष्ट्रपिता’ महात्मा गाँधी के सन्दर्भ में प्रसिद्ध है.

विश्व की महान क्रांतियों में शुमार किये जाने वाले भारतीय स्वाधीनता संग्राम का आधार बने गाँधी को येन-केन-प्रकारेण इस आन्दोलन से अछूता नहीं किया जा सकता. गाँधी का योगदान आजादी की लड़ाई में अतुलनीय है.

गाँधी ने आजादी हेतु संघर्ष की शुरुआत सन् 1915 में दक्षिण अफ्रीका से लौटने के बाद, गाँधी ने जमींदारी प्रथा व इसके नकारात्मक पक्षों, भेदभाव जैसी मूलभूत सामाजिक समस्याओं के खिलाफ आन्दोलन का बिगुल बजाकर की.

यह गाँधी के सामाजिक-राजनीतिक आन्दोलन व इसकी सफलता के साथ-साथ राष्ट्रीय पटल पर गाँधी के आगमन की पहली बानगी थी. इसी कड़ी में, सन् 1921 में भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के अध्यक्ष पद का भार सँभालने के बाद उन्होंने विभिन्न राष्ट्रव्यापी सामाजिक-राजनीतिक आंदोलनों का नेतृत्व किया.

वर्ष 1930 में दांडी पदयात्रा की शुरुआत तक आते-आते गाँधी राष्ट्रीय पटल एवं जनमानस के बीच अपनी लोकप्रिय छवि व छाप छोड़ चुके थे. गाँधी की इस वैयक्तिक सफलता के पीछे उनकी कार्यप्रणाली का अहिंसात्मक एवं शांतिप्रिय होना था.

शांति व अहिंसा के मसीहा गाँधी ने ब्रिटिश साम्राज्य के खिलाफ विरोध प्रदर्शन के तरीकों में भी अहिंसावादी साधनों का इस्तेमाल किया, जिसमें पदयात्रा, अनशन और सरकारी संस्थाओं का बहिष्कार मुख्य थे.

1942 के ‘भारत छोड़ो आन्दोलन’ के दौरान, विरोध के इन्हीं साधनों को आमजन का सर्वव्यापी समर्थन प्राप्त हुआ. गाँधी की इसी कार्यप्रणाली से प्रभावित होकर विश्व के सबसे प्रतिष्ठित पुरस्कार ‘नोबेल’ में ‘शांति’ के क्षेत्र में उन्हें पांच बार इस पुरस्कार हेतु नामांकित किया गया लेकिन विडम्बना ये रही कि, उन्हें यह पुरस्कार कभी नहीं मिल पाया.

आलोचकों का मत है कि गाँधी का योगदान केवल आजादी तक ही सीमित था, लेकिन ये तथ्य आज के दौर में ‘फेक-न्यूज़’ जैसा है क्योंकि महात्मा गाँधी के सुधार व परिवर्तन केवल स्वाधीनता संग्राम तक ही सीमित नहीं थे, अपितु उन्होंने भारतीय समाज में सर्वांगीण परिवर्तन का सूत्रपात भी किया.

पुनर्जागरण के ऐतिहासिक दौर की समाप्ति के बाद भी, उन्होंने पिछड़े हुए भारतीय समाज में व्याप्त बुराईयों का विरोध किया, जिसके अंतर्गत महिला शिक्षा, अस्पृश्यता व शराबबंदी के लिए सकारात्मक परिवर्तन की अलख जगाई.

गाँधी के अनुसार “अस्पृश्यता भारतीय समाज में व्यापत सबसे बड़ी बुराई है.” गाँधी ने अन्य सामाजिक मुद्दों पर अपनी बेबाक राय रखने के साथ ही आम जनमानस को भी इसी समाधान प्रक्रिया का हिस्सा बनाया. गाँधी की आलोचना की इसी श्रृंखला में सन् 1942 के ‘भारत छोड़ो आन्दोलन’ का भी आमतौर पर जिक्र किया जाता है.

वर्तमान समय में उक्त आन्दोलन की सफलता-असफलता को लेकर आमजन एवं पर्यवेक्षकों के मध्य विरोधाभास हो सकते हैं लेकिन अलग मायनों में यह आन्दोलन आम भारतीयों का सुसंगठित व व्यवस्थित स्वरूप था और इस बात से किसी भी कीमत पर इनकार नहीं किया जा सकता.

15 अगस्त 1947 को, जब देश औपनिवेशिक ताकतों की बेड़ियों से निकलकर आजादी का जश्न बना रहा था, तब गाँधी जी आजादी से सालभर पहले, बंगाल के नोआखली में शुरू हुए साम्प्रदायिक दंगों के पीड़ितों के साथ अनशन पर गमगीन होकर बैठे थे.

आजादी के जश्न के मौके पर जब पं. जवाहरलाल नेहरु और सरदार वल्लभ भाई पटेल ने पत्र के माध्यम से जश्न में शरीक होने का न्यौता दिया तो, गाँधी ने निमंत्रण अस्वीकार कर दिया क्योंकि वे देश के विभाजन व दंगों से दुखी थे.

इस वर्ष देश, इस महान आत्मा की 150वीं जयंती मनाएगा. ये गाँधी की दृढ-शक्ति का ही परिणाम था कि देश ने संघर्ष कर आजादी पाई और साथ ही वे अन्य क्रांतिकारियों के लिए प्रेरणास्रोत बने.

हमें चाहिए कि, हम वर्तमान युग में गाँधी के विचारों का आदान-प्रदान करें और समाज में गांधीवादी मूल्यों की स्थापना करें. यही ‘बापू’ को हमारी सबसे बड़ी श्रद्धांजलि होगी.

याद रखिए गाँधी कल भी प्रासंगिक थे, आज भी हैं और कल भी रहेंगे.

Written by:
केशव शर्मा
राजस्थान विश्वविद्यालय, जयपुर

भारत को महात्मा गाँधी की पुनः जरूरत India needs Mahatma Gandhi again

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