क्या फार्मासिस्ट मंदिर का घंटा है जिसे हर कोई बजा लेता है?

क्या फार्मासिस्ट मंदिर का घंटा है जिसे हर कोई बजा लेता है? - फार्मासिस्ट हेल्थ केयर सिस्टम का हिस्सा है या नहीं, यह बड़ा विचारणीय प्रश्न है. जिस तरीके से सरकारें फार्मासिस्ट के साथ व्यवहार कर रही हैं उसे देखकर तो यही लगता है कि फार्मासिस्ट का नाम अन्य स्वास्थ्य कर्मियों जैसे डॉक्टर, नर्स, रेडियोग्राफर में नहीं आता है.


इन्हें तो छोड़ो, सरकार की नजर में वार्ड बॉय, वाहन चालक और सफाई कर्मियों की अहमियत भी फार्मासिस्ट से अधिक है. यह बात मैं राजस्थान सरकार के चिकित्सा एवं स्वास्थ्य विभाग के हालिया आदेश को देखकर कह रहा हूँ.

इस आदेश में कोरोना महामारी की जाँच और उपचार में लगे लगभग सभी स्वास्थ्य कर्मियों को प्रोत्साहन राशि जारी की गई है. इस आदेश में फार्मासिस्ट को छोड़कर लगभग सभी स्वास्थ्य कर्मियों के नाम है.

फार्मासिस्ट को प्रोत्साहन राशि नहीं देना यही दिखाता है कि सरकार की नजर में फार्मासिस्ट की अहमियत महज एक दवा वितरक की ही है फिर चाहे वह सरकारी हॉस्पिटल हो या स्वयं का निजी ड्रग स्टोर.

सरकार फार्मासिस्ट को मरीज की देखभाल के लिए ना तो जिम्मेदार मानती है और ना ही इस लायक समझती है.

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यहाँ प्रोत्साहन राशि कितनी है इसका कोई महत्त्व नहीं है. प्रोत्साहन राशि मात्र एक सम्मान को दर्शाती है और सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि यह सम्मान फार्मासिस्ट को नहीं मिला है.

जब इस विश्वव्यापी महामारी में ही फार्मासिस्ट की कोई उपयोगिता नहीं मानी जा रही है तब सामान्य दिनों में फार्मासिस्ट की कितनी उपयोगिता इस हेल्थ केयर सिस्टम में होगी, इसका अंदाजा भलीभाँति लगाया जा सकता है.

प्रोत्साहन राशि न देने के साथ-साथ स्वास्थ्य विभाग फार्मासिस्ट के स्वास्थ्य के साथ भी खिलवाड़ कर रहा है. स्वास्थ्य विभाग डॉक्टर्स और नर्सिंग कर्मियों की तो बराबर स्क्रीनिंग कर रहा है लेकिन फार्मासिस्ट को यहाँ पर भी छोड़ा जा रहा है.

यह बात मैं इस आधार पर कह रहा हूँ क्योंकि चूरू के जनाना हॉस्पिटल में सभी स्वास्थ्य कर्मियों की स्क्रीनिंग हो रही है लेकिन फार्मासिस्टों की नहीं.

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यह खबर एक जगह की है बाकी सम्पूर्ण देश में क्या हो रहा होगा इसका अंदाजा हम बड़ी आसानी से लगा सकते हैं. फार्मासिस्टों को खुद जा जाकर अपनी स्क्रीनिंग करवानी पड़ रही है.

इस महामारी में भी फार्मासिस्ट को मंदिर के घंटे की तरह क्यों बजाया जा रहा है? क्यों फार्मासिस्ट सरकार की नजर में अपनी उपयोगिता सिद्ध नहीं कर पा रहा है? क्यों फार्मासिस्ट को हेल्थ केयर सिस्टम का हिस्सा नहीं समझा जा रहा है?

वैसे केन्द्रीय मंत्री नितिन गडकरी ने ट्विटर पर फार्मासिस्टों को कोरोना के विरुद्ध चल रहे युद्ध में मेडिकल सपोर्ट सिस्टम की रीढ़ बताया है. गौरतलब है कि नितिन गडकरी वर्तमान में रोड ट्रांसपोर्ट मंत्री हैं जिनका स्वास्थ्य मंत्रालय से कोई सम्बन्ध नहीं है.

इस ट्वीट से बहुत से अति उत्साही फार्मासिस्टों के मन खुशी के मारे झूम उठे हैं. ये फार्मासिस्ट अपने खून में एक नए उत्साह का संचार होना बता रहे हैं.

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अति उत्साह में ये यह भी भूल गए हैं कि केंद्र सरकार ने शेड्यूल K के सीरियल नंबर 23 में अमेंडमेंट कर रूरल से अर्बन क्षेत्रों में फार्मासिस्ट की जगह नर्सिंग कर्मियों, एएनएम, आंगनबाड़ी वर्कर्स के साथ आशा वर्कर्स आदि से दवा वितरित करवाने के लिए गजट नोटिफिकेशन निकाल रखा है.

फार्म डी डिग्री होल्डर डॉक्टर्स की हालत भी किसी से छुपी हुई नहीं है. क्लिनिकल एक्सपीरियंस वाले इन डॉक्टर्स को ही जब इस कोरोना नामक महामारी से लड़ने के लिए योग्य नहीं माना जा रहा है तो फिर मात्र दवा वितरित करने वाले फार्मासिस्ट की क्या अहमियत होगी, इस बात को अच्छी तरह से समझा जा सकता है.

वैसे ले देकर सभी जगह फार्मासिस्ट की इमेज मात्र दवा विक्रेता के रूप में ही बनी हुई है. फार्मासिस्ट के लिए रोजगार के अवसरों को इस बात से अच्छी तरह से समझा जा सकता है कि डी फार्म योग्यता के लिए सृजित फार्मासिस्ट के पदों के लिए बी फार्म, एम फार्म और पीएचडी होल्डर भी अभ्यर्थी के रूप में कतार में मौजूद हैं.

जब एम फार्म और पीएचडी जैसी उच्च योग्यता वाले कैंडिडेट, डी फार्म योग्यता के लिए निकाली गई नौकरी के लिए अप्लाई कर रहे हों तो रोजगार के अवसरों का अंदाजा लगाना मुश्किल नहीं है.

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अंत में सारांश यह है कि फार्मेसी क्षेत्र के लोगों को सबसे पहले तो यही तय करना होगा कि क्या वास्तव में फार्मासिस्ट हेल्थ केयर सिस्टम का हिस्सा है? क्या वास्तव में फार्मासिस्ट को कोई क्लिनिकल एक्सपीरियंस होता है? क्या फार्मासिस्ट को नर्सिंग कर्मी की तरह मरीज की देखभाल के लिए तैयार किया जाता है?

वैसे आज तक तो यह ही तय नहीं हो पाया है कि फार्मेसी ब्रांच हेल्थ केयर का हिस्सा है या फिर टेक्नोलॉजी का. फार्मेसी कोर्स इंजीनियरिंग का हिस्सा है या फिर मेडिकल का.

जब तक यह तय नहीं होगा शायद फार्मासिस्ट इसी तरह मंदिर के घंटे की तरह बजता रहेगा.

क्या फार्मासिस्ट मंदिर का घंटा है जिसे हर कोई बजा लेता है? Pharmacists are played as bell of temple

Written by:
Ramesh Sharma

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