कोरोना वायरस कागज और गत्ते पर जिन्दा रह सकता है तो अखबार पर क्यों नहीं

कोरोना वायरस कागज और गत्ते पर जिन्दा रह सकता है तो अखबार पर क्यों नहीं - सम्पूर्ण विश्व इस समय कोरोना वायरस से फैली कोविड 19 नामक संक्रामक बीमारी से भयाक्रांत होने के साथ-साथ अलग थलग पड़ा हुआ है.


अंतर्राष्ट्रीय सीमाएँ बंद हो चुकी हैं. लोग जिस जगह पर थे उसी जगह पर जाम हो चुके हैं. यह बीमारी अत्यंत संक्रामक है जो एक व्यक्ति से दूसरे व्यक्ति में बड़ी तेजी से फैल रही है.

बिना जेब से पैसा खर्च किए लूट रहे हैं वाहवाही

इंसान से इन्सान में फैलने के साथ-साथ यह बीमारी बहुत सी वस्तुओं, सतहों को छूने से भी फैल रही है. इस बीमारी का वायरस हवा के साथ-साथ बहुत सी सतहों पर भी काफी समय तक जिन्दा रहता है.

U.S. Department of Health and Human Services के National Institutes of Health (NIH) के अनुसार यह वायरस एयरोसोल में 3 घंटे, कागज एवं कार्डबोर्ड (गत्ता) पर 1 दिन, प्लास्टिक एवं स्टील पर 2 से 3 दिन एवं ताम्बे पर 4 घंटे तक जिन्दा रह सकता है. लगभग इसी प्रकार की जानकारी आज तक ने भी उपलब्ध करवाई है.

लेकिन प्रिंट मीडिया जिसमे समाचार पत्र प्रमुख रूप से आते हैं, अपने अखबारों में बार-बार यह सूचना प्रकाशित कर रहा है कि अखबार सुरक्षित है और इससे कोरोना वायरस नहीं फैलता है.

इन अखबारों में बहुत से सरकारी प्रशासनिक अफसरों की अखबार पढ़ते हुए की फोटो डाली जा रही है और इनके हवाले से अखबार विशेष का नाम लिख कर छापा जा रहा है कि यह अखबार प्रामाणिक जानकारी देता है और अखबार सुरक्षित है.

सबसे पहली बात तो यह है कि क्या कोई सरकारी अधिकारी किसी अखबार विशेष के लिए फोटो खिंचवा सकते हैं? क्या ये अधिकारी किसी अखबार विशेष को पढने के लिए आम जनता को प्रेरित कर सकते हैं? क्या सरकारी अफसर इस तरह से किसी निजी मीडिया हाउस का अप्रत्यक्ष रूप से प्रचार कर सकते हैं?

क्या कुछ समय तक अखबार नहीं पढने से देश का किसी तरह से कोई नुकसान हो रहा है? क्या हम अखबार पढ़कर राष्ट्र की प्रगति में कोई योगदान दे रहे हैं? जब सभी अखबारों की वेबसाइट और ई पेपर पर सारी जानकारी मिल जाती है तो क्या कुछ समय के लिए अखबार नहीं पढना गलत है?

मेरे विचार में यह कतई सही नहीं है कि कोई सरकारी अधिकारी किसी निजी मीडिया हाउस का इस तरह अप्रत्यक्ष रूप से प्रचार करें. ये अधिकारी जिन अखबारों के लिए अपनी फोटो खिंचवा रहे हैं, वे कोई सरकारी संस्थान नहीं है. ये सभी निजी क्षेत्र की कंपनियों द्वारा संचालित हो रहे हैं.


दूसरी बात, कोई आदमी किस आधार पर यह कह सकता है कि अखबार से कोरोना वायरस या अन्य कोई संक्रामक बीमारी नहीं फैल सकती है? जब कागज, गत्ता और कपडे तक इस संक्रामक बीमारी को फैलाने में सहायक है तब अखबार किस तरह से सुरक्षित हो सकता है.

सभी मीडिया हाउस ये कह रहे हैं कि अखबार को छापने की पूरी प्रक्रिया मशीनों द्वारा होती है जिसमे इंसान  की भूमिका नहीं होती है. यह बात ठीक है कि प्रिंटिंग की प्रक्रिया में अखबार पूरी तरह से सुरक्षित हो सकता है.


लेकिन जब यह अखबार छप कर वितरित होने के लिए अलग-अलग शहरों और गाँवों में वितरकों के पास पहुँचता है तब यह उस तरह सुरक्षित नहीं रह जाता जिस तरह यह प्रिंटिंग प्रेस में था. आम जनता तक अखबारों का वितरण आटोमेटिक नहीं होता, मशीनें इन्हें वितरित नहीं करती. इन्हें हॉकर के द्वारा घर-घर पहुँचाया जाता है.

वितरक अपने हॉकर के साथ बैठकर किस तरह से लोकल एडिशन और पम्फलेट को उस अखबार में डालते हैं यह किसी से छुपा हुआ नहीं है. मैंने खुद कई बार सुबह-सुबह इन्हें सड़क के किनारे बैठकर अखबारों को जमाते हुए देखा है.

जब कागज और गत्ते पर कोरोना वायरस जिन्दा रह सकता है तो अखबार पर क्यों नहीं

जब एरिया के अनुसार अखबार पैक हो जाते हैं तब हॉकर अपने थैलों में इन्हें डालकर वितरित करने के लिए साइकिल या दोपहिया वाहन पर निकलते हैं.

जब कागज और गत्ते पर कोरोना वायरस जिन्दा रह सकता है तो अखबार पर क्यों नहीं

अगर कोई वितरक या हॉकर इस बीमारी से संक्रमित हुआ तो क्या वह इस अखबार को संक्रमित नहीं करेगा क्योंकि कागज पर यह वायरस एक दिन तक जिन्दा रहता है. क्या ये लोग अपने कपड़ों और वाहन को बार बार सेनीटाईज करते होंगे क्योंकि यह वायरस प्लास्टिक एवं स्टील पर 2 से 3 दिनों तक जिन्दा रहता है.


आज पूरा देश लॉक डाउन पड़ा है, सारी इंडस्ट्रीज बंद पड़ी हैं, फिर प्रिंट मीडिया अपने पाठकों को बनाये रखने के लिए ये जतन क्यों कर रहा है. भोजन पानी नहीं मिलने से मनुष्य मर सकता है परन्तु अखबार नहीं पढने से कोई मरा हो ऐसा अभी तक तो मैंने नहीं देखा है.

आज का युग टेक्नोलॉजी का युग है. इन्टरनेट पर सभी तरह की सूचना मौजूद हैं. यह ठीक है कि सोशल मीडिया पर फेक न्यूज का बोलबाला है लेकिन सोशल मीडिया पर ऑथेंटिक न्यूज का भी बहुत अधिक बोलबाला है.

सभी बड़े न्यूज चैनल और प्रिंट मीडिया हाउस ने सोशल मीडिया पर अपनी उपस्थिति दर्ज करवा रखी है जहाँ से ऑथेंटिक सूचना बड़ी आसानी से प्राप्त की जा सकती है. अगर इन मीडिया हाउसेस की नजर में सोशल मीडिया की कोई अहमियत नहीं होती तो कभी भी अपने अकाउंट फेसबुक, यूट्यूब, ट्विटर और इन्स्टाग्राम पर नहीं बनाते.

जब सभी बड़े अखबारों के ई पेपर ऑनलाइन पढने के लिए मौजूद हैं, जब बड़े बड़े टीवी चैनल चौबीसों घंटे सूचना देते रहते हैं तो फिर कुछ समय के लिए अखबार नहीं पढने से कौनसा तूफान खड़ा हो जाएगा?

मेरे हिसाब से प्रिंट मीडिया को अपने ग्राहक खोने का डर सता रहा है कि अगर एक बार लोग प्रिंट मीडिया को छोड़ देंगे तो फिर वापस लौटना बड़ा मुश्किल हो सकता है. वैसे भी इन्टरनेट और स्मार्टफोन ने बहुत सी ऑफलाइन चीजों की कमर तौड़ दी है.

जब दुनिया के किसी भी कोने में बैठे-बैठे कोई भी जानकारी इन्टरनेट के माध्यम से मोबाइल पर फ्री में उपलब्ध हो जाती है तब पैसे खर्च करके जबरदस्ती का रिस्क लेना कहाँ की समझदारी है?

मैंने अपने विचार शेयर किए है बाकि निर्णय पाठकों को लेना है कि जब तक इस महामारी का संकट समाप्त न हो जाए तब तक आप अपने जीवन के लिए जरूरी चीजों के अलावा अन्य गैरजरूरी वस्तुओं के संपर्क में आने से बच सकते है या नहीं.

कोरोना वायरस कागज और गत्ते पर जिन्दा रह सकता है तो अखबार पर क्यों नहीं Corona Virus Can Survive on Paper and Cardboard, Why Not on Newspaper

Written by:
Ramesh Sharma
Pharmacist (M Pharm)

ramesh sharma smpr news

Keywords - corona virus and newspaper, covid 19 through newspaper, newspaper spreading corona virus, newspaper spreading covid 19, corona virus disease 19, corona virus disease, corona virus spreading through surface, corona virus spreading through paper, corona virus spreading through cardboard, government officer promoting newspaper, government official promoting newspaper, newspaper risky in corona, epaper, social media, smpr news

Post a Comment

0 Comments