17 वर्षों में बनी थी खंडेला की कालीबाय की बावड़ी

17 वर्षों में बनी थी खंडेला की कालीबाय की बावड़ी  - सीकर जिले का खंडेला कस्बा अपने गोटा उद्योग एवं ऐतिहासिक धरोहरों के कारण सम्पूर्ण भारत में प्रसिद्ध है.

हजारों वर्ष पुराने इस कस्बे ने अपने आगोश में कई ऐतिहासिक विरासतों को छुपा कर रखा है. इन धरोहरों में बावडियों का नाम प्रमुखता से लिया जाता है.


किसी समय खंडेला में कुल 52 बावडियाँ हुआ करती थी जिसकी वजह से इसे बावन बावडियों वाला खंडेला या बावडियों का शहर कहा जाता था.

इन बावडियों में कालीबाय, बहूजी, सोनगिरी (सोंगरा), मूनका, पलसानिया, मांजी, द्रौपदी, पोद्दार, काना, लाला, द्वारकादास आदि के नाम प्रमुखता से लिए जाते हैं.



आज हम कालीबाय की बावड़ी के सम्बन्ध में चर्चा करेंगे. यह बावड़ी खंडेला से लगभग डेढ़ किलोमीटर दक्षिण दिशा में पलसाना रोड पर स्थित है.

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बावड़ी का निर्माण कार्य अग्रवाल गर्ग गोती कोल्हा के पुत्र पृथ्वीराज एवं उसके पुत्र रामा और बाल्हा ने करवाया था.

पंडित झाबरमल शर्मा ने इस बावड़ी से प्राप्त एक शिलालेख के अनुसार बावड़ी का निर्माण कार्य विक्रम संवत् 1575 (1518 ईस्वी) फागुन सुदी 13 से शुरू हुआ एवं विक्रम संवत 1592 (1535 ईस्वी) जेठ सुदी को पूर्ण हुआ.

इस प्रकार इस बावड़ी के निर्माण कार्य में कुल 17 वर्षों का समय लगा था. उस समय खंडेला पर निर्बाण राजाओं का शासन था एवं तत्कालीन शासक का नाम रावत नाथू देव निर्बाण था.

17 वर्षों में बनी थी खंडेला की कालीबाय की बावड़ी

जब बावड़ी का निर्माण कार्य शुरू हुआ तब दिल्ली पर सुल्तान इब्राहीम लोदी का शासन था एवं जब निर्माण कार्य पूर्ण हुआ तब दिल्ली पर बादशाह हुमायूँ का शासन था.

इस प्रकार इस बावड़ी के निर्माण कार्य के दौरान दिल्ली पर तीन शासकों ने शासन किया. दिल्ली में सत्ता परिवर्तन भी हुआ एवं सत्ता की बागडोर अफगानों से मुगलों के हाथ में आ गई. सुल्तानों की जगह बादशाह शासक बन गए.

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सीकर स्थित हरदयाल संग्रहालय की क्यूरेटर धर्मजीत कौर के अनुसार इस बावड़ी की दीवारों पर 8वीं शताब्दी की प्रतिमाएँ लगी हुई है. धर्मजीत कौर के इस कथन के बाद बावड़ी के और भी अधिक प्राचीन होने के कयास लगाए जा रहे हैं.

देखने में यह बावड़ी आयताकार रूप में लगभग चार या पाँच मंजिला गहरी प्रतीत होती है. बावड़ी के पीछे की तरह एक कुआँ बना हुआ है. बावड़ी के अवशेषों को देखकर इसकी स्थापत्य कला का अंदाजा लगाया जा सकता है.

बावड़ी को देखकर यह अंदाजा लगाना मुश्किल नहीं है कि अपने उपयोग के समय यह बहुत से लोगों की प्यास भी बुझाती होगी.

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हमारे पुरखों ने जिस जतन और प्यार से इस बावड़ी को संजोकर रखा था, हम उससे दुगने जतन से इसे नष्ट करने में लगे हुए हैं.

वर्तमान में इस बावड़ी की हालत अत्यंत दयनीय है. स्थानीय निवासियों ने इसे कूड़ादान बना दिया है. इसके अन्दर जाने का रास्ता भी पूरी तरह से अवरुद्ध है.

लगता है कि अब वह दिन दूर नहीं है जब हमारे पुरखों की ये अनमोल निशानियाँ, इनके प्रति हमारे बेरुखेपन और लापरवाही की वजह से जमींदोज हो जाएगी.

राजस्थान सरकार द्वारा प्रकाशित सुजस पत्रिका के सितम्बर 2017 के अंक में पेज नंबर 48-49 पर इस बावड़ी को जगह दी गई है.

सुजस का सितम्बर 2017 का अंक यहाँ देखें

17 वर्षों में बनी थी खंडेला की कालीबाय की बावड़ी  Kalibay stepwell Khandela built in 17 years duration

Written by:
Ramesh Sharma

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