फार्मासिस्टों को यह खबर क्यों नहीं शेयर करनी चाहिए?

फार्मासिस्टों को यह खबर क्यों नहीं शेयर करनी चाहिए - आज सुबह से ही फार्मेसी फील्ड के लोग राजस्थान फार्मेसी कौंसिल के अध्यक्ष द्वारा फार्मासिस्ट को कोरोना योद्धा बताए जाने पर खुशी से सराबोर हो रहे हैं.

फार्मेसी के शिक्षक, फार्मेसी के तथाकथित नेता, सरकारी फार्मासिस्ट की नौकरी की तैयारी कर रहे बेरोजगार फार्मासिस्ट और अन्य सभी लोग जिनका फार्मेसी से कोई नाता है, बहुत प्रसन्न है.

ऐसा लगता है कि अब फार्मासिस्ट के सभी दुख दूर हो जाएँगे. फार्मेसी कॉलेजों द्वारा शिक्षकों की सौ प्रतिशत तक काटी गई तनख्वाह अब सूद समेत मिल जाएगी. सरकारी फार्मासिस्ट की सालों से प्रतीक्षारत भर्ती अब पूरे 17000 से अधिक पदों के लिए हो जाएगी.

कौंसिल के डॉक्टर अध्यक्ष ने फार्मासिस्ट को कोरोना योद्धा बता दिया है इसलिए अब फार्मेसी डिग्री धारियों को ड्रग मैन्युफैक्चरिंग इंडस्ट्री में विशेष पैकेज के ऊपर नौकरी मिल जाएगी. साथ ही इनमे विज्ञान के स्नातकों की जगह केवल फार्मेसी डिग्री होल्डर्स को ही नौकरी मिलेगी.

फार्मासिस्टों को यह खबर क्यों नहीं शेयर करनी चाहिए

ऐसा लग रहा है कि चारों तरफ बहार ही बहार होगी. कितना सुन्दर सपना है, यह सपना टूटना नहीं चाहिए. टूटेगा भी कैसे, बहुत से लोग इस सपने को सभी को दिखाने का प्रयास भी कर रहे हैं.

एक डॉक्टर द्वारा फार्मासिस्ट की पीठ थपथपाए जाने से उत्साहित फार्मासिस्टों की सोच पर तरस आता है. जो डॉक्टर कम्युनिटी Schedule K के section 23 के माध्यम से फार्मासिस्ट का हक खा रही है आज फार्मेसी के तथाकथित बुद्धिमान लोग उसी कम्युनिटी को अपना सर्वेसर्वा मान रही है.

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अब फार्मेसी फील्ड के लोग किस मुँह से यह मांग करेंगे कि राजस्थान सहित अन्य सभी फार्मेसी कौंसिल का अध्यक्ष केवल फार्मासिस्ट ही होना चाहिए.

आखिर फार्मासिस्ट किसी डॉक्टर को आप अपना सर्वेसर्वा कैसे मान सकते हैं? क्या फार्मासिस्टों में से कोई भी इतना काबिल नहीं है? क्या डॉक्टर्स ने कभी किसी संस्था में फार्मासिस्ट या अन्य किसी को अपना सर्वेसर्वा माना है?

ड्रग्स एंड कॉस्मेटिक्स एक्ट के Schedule K के section 23 के माध्यम से डॉक्टर्स पहले ही फार्मासिस्ट का काफी अधिकार छीन कर बैठे हैं. क्या आप इस मुगालते में है कि कोई डॉक्टर Schedule K में बदलाव के लिए आपका साथ देगा. जब सारे फार्मेसी के लोग ही साथ नहीं हैं तो फिर किसी और से कोई उम्मीद कैसे की जा सकती है.

पहले से ही फार्मेसी फील्ड के लोगों की किस्मत दवा विक्रेताओं और डॉक्टर्स के हाथों में ही है. वैसे भी फार्मासिस्ट बड़ा संतोषी और धैर्यवान है जिसका सबूत यह है कि अधिकांश फार्मासिस्टों को तो फार्मेसी की पढाई के एवज में डेढ़-दो हजार मासिक से ज्यादा चाहिए भी नहीं. हाँ, भुगतान मासिक हो या एकमुश्त एडवांस हो, इस पर थोडा ईगो जरूर होता है.

याद रहे कि फार्मासिस्ट को कोरोना योद्धा तो केन्द्रीय मंत्री नितिन गडकरी ने भी बताया था, उससे क्या हो गया. खाली पीठ थपथपाये जाने से कुछ नहीं होता, धरातल पर भी कुछ नजर आना चाहिए.

फार्मेसी कॉलेजों में विद्यार्थियों से फीस सत्र शुरू होते ही ले ली जाती है. फिर क्या कारण है कि कई कॉलेजों में टीचर्स को या तो पूरी सैलरी नहीं दी गई है या कुछ प्रतिशत ही दी गई है. एक बड़े नामी कॉलेज में तो मात्र 25 प्रतिशत और एक नामी यूनिवर्सिटी में 65 प्रतिशत सैलरी ही दी गई है.

सुनने में आया है कि एक फार्मेसी कॉलेज में तो दिसम्बर के महीने से ही सैलरी नहीं दी गई है जबकि वहाँ का प्रिंसिपल यूनिवर्सिटी में बड़ा दखल रखता है. अगर यह सब सच है तो बड़ा शर्मनाक है.

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राजस्थान फार्मेसी कौंसिल को इस बाबत भी कुछ बोलना चाहिए. लेकिन जब आज तक ही कोई नहीं बोला तो अब कोई क्यों बोलेगा? वैसे भी बोलने का पहला हक उनका है जो पिस रहे हैं. जब वो ही चुप रहकर सहन कर रहे हैं तो किसी और को क्या लेना देना है. सबको अपनी जो सोचनी है.

हाँ, कौंसिल उस बात पर जरूर बोली जिस बात के लिए उसे नहीं बोलना चाहिए था. फार्मासिस्ट भर्ती का मामला फार्मासिस्टों पर ही छोड़ देना चाहिए. एक तो पहले से ही नियुक्ति परीक्षा से हो या प्रतिशत से, को लेकर सभी फार्मासिस्ट रणबांकुरे बने हुए हैं ऊपर से किसी भी एक पक्ष के पक्ष में बोलने से मतभेद बढ़ने के अलावा कुछ नहीं होगा.

वैसे, यह कौंसिल भी तो उसी कौंसिल का भिन्न अंग है जिसने एक सत्र में एक हजार से अधिक कॉलेज खोलकर जन जन में फार्मेसी की शिक्षा को फैलाने का कार्य किया है.

खैर लगे रहो, सभी फार्मासिस्टों को फायदा हो या न हो लेकिन आपके इस खबर के ज्यादा से ज्यादा शेयर करने पर कुछ लोगों को प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप में फायदा जरूर होने वाला है.

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Written by:
Ramesh Sharma

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