फार्मा मैन्युफैक्चरिंग इंडस्ट्री में बी फार्म की जरूरत

फार्मा मैन्युफैक्चरिंग इंडस्ट्री में बी फार्म की  जरूरत – जब कोई विद्यार्थी किसी कोर्स में प्रवेश लेता है तो उसका सपना उस क्षेत्र की टॉप मोस्ट जॉब को प्राप्त करना होता है. यही सिचुएशन फार्मेसी के स्टूडेंट के साथ भी हैं.


फर्स्ट ईयर में फार्मेसी स्टूडेंट का लक्ष्य ड्रग इंस्पेक्टर (Drug Inspector) जैसी रोबदार नौकरी प्राप्त करना होता है क्योंकि अधिकांश स्टूडेंट्स का इस कोर्स में एडमिशन ही इसी सपने के साथ होता है.

सेकंड ईयर में थोड़ी परिपक्वता आनी शुरू हो जाती है और पता लगता है कि ड्रग इंस्पेक्टर की नौकरी तो ऊँट के मुँह में जीरे के समान ही निकलती है. अब लक्ष्य ड्रग इंस्पेक्टर से थोडा घटकर सरकारी फार्मासिस्ट का हो जाता है.

मन को तसल्ली दी जाती है कि फार्मासिस्ट की नौकरी भले ही डिप्लोमा स्तर की हो लेकिन सरकारी तो है और सरकारी नौकरी मिलना बड़ी बात लगने लगती है.

थर्ड ईयर में पता चलता है कि सरकारी फार्मासिस्ट की नौकरी भी काफी कम निकलती है जबकि भारत में प्रति वर्ष तीन लाख से ऊपर विद्यार्थी फार्मेसी में डिप्लोमा या डिग्री करके निकलते हैं. अब लक्ष्य रिसर्च और डेवलपमेंट का होना लगता है.

फाइनल ईयर समाप्त होते-होते किसी भी तरह से फार्मा मैन्युफैक्चरिंग या फार्मा मार्केटिंग में कोई नौकरी पाने की जद्दोजहद शुरू हो जाती है.

फार्मा मैन्युफैक्चरिंग इंडस्ट्री में बी फार्म की जगह बीएससी को प्राथमिकता

अधिकांश फार्मेसी ग्रेजुएट्स इस प्रकार के दौर से गुजरते है.

यह बात तो लगभग सभी लोग जानते हैं कि फार्मेसी के ग्रेजुएट की फार्मा मार्केटिंग के क्षेत्र में कोई मोनोपोली नहीं है और इस क्षेत्र में साइंस और आर्ट्स के ग्रेजुएट्स की भरमार है.

वैसे भी देखा जाए तो जिस प्रकार डॉक्टर और नर्स के लिए मार्केटिंग का क्षेत्र नहीं है ठीक उसी प्रकार फार्मेसी के ग्रेजुएट के लिए भी यह क्षेत्र नहीं है. इस विषय में हम कभी और चर्चा करेंगे.

हाँ, तो फार्मेसी ग्रेजुएट को असली सदमा तब लगता है जब उसे पता चलता है कि फार्मा मैन्युफैक्चरिंग में भी हालत कमोबेश वैसे ही हैं जैसे मार्केटिंग में है.

जो फार्मेसी ग्रेजुएट अपने आप को ड्रग एक्सपर्ट की संज्ञा देता है, जो फार्मेसी ग्रेजुएट अपने आप को दवाइयों का जन्मदाता मानता है, वो ड्रग मैन्युफैक्चरिंग इंडस्ट्री में जाकर अपने आपको ठगा सा महसूस करने लगता है.

यहाँ इसे पता चलता है कि ड्रग मैन्युफैक्चरिंग यूनिट में फार्मेसी ग्रेजुएट की कोई मोनोपोली नहीं है. यहाँ भी इसे नौकरी पाने के लिए साइंस के ग्रेजुएट के साथ-साथ केमिकल इंजीनियरिंग और मेडिसिन में स्नातक के साथ कड़ी प्रतिस्पर्धा का सामना करना पड़ता है.

फार्मेसी ग्रेजुएट सोचता है कि जब ड्रग एक्सपर्ट मैं हूँ तो फिर ये दूसरे लोग यहाँ क्या कर रहे हैं. लेकिन पहले से चले आ रहे नियम कायदों के आगे वह बेबस हो जाता है.

ये सभी नियम कायदे सम्पूर्ण स्वास्थ्य क्षेत्र को गोवर्न करने वाले भारत सरकार के मिनिस्ट्री ऑफ हेल्थ एंड फॅमिली वेलफेयर द्वारा निर्मित ड्रग्स एंड कॉस्मेटिक्स एक्ट 1940 एंड रूल्स 1945 में दिए हुए हैं.

इस एक्ट को आप भारत सरकार के स्वास्थ्य विभाग के अंतर्गत आने वाले सेंट्रल ड्रग स्टैण्डर्ड कण्ट्रोल आर्गेनाईजेशन (CDSCO) की वेबसाइट पर जाकर देख सकते हैं. यहाँ पर आप 31 दिसम्बर 2016 तक अमेंड हुआ ड्रग्स एंड कॉस्मेटिक्स एक्ट पढ़ सकते हैं.

Drugs and Cosmetics Act, 1940 and Rules, 1945 (As amended up to the 31st December, 2016) at https://cdsco.gov.in/opencms/opencms/en/Acts-Rules/

अगर आप इस एक्ट को ध्यान से पढेंगे तो पाएँगे कि ड्रग मैन्युफैक्चरिंग के लगभग सभी विभागों (जैसे प्रोडक्शन, टेस्टिंग आदि) में फार्मेसी के ग्रेजुएट के अतिरिक्त केमिस्ट्री सब्जेक्ट के साथ जनरल साइंस (बायोलॉजिकल प्रोडक्ट्स की यूनिट के लिए केमिस्ट्री के साथ माइक्रोबायोलॉजी सब्जेक्ट), केमिकल इंजीनियरिंग, केमिकल टेक्नोलॉजी और मेडिसिन में ग्रेजुएट की भी बराबर की अहमियत मिलती है.

वेटरनरी यूज के लिए बनाये जाने वाली मैन्युफैक्चरिंग यूनिट में फार्मेसी के साथ-साथ वेटरनरी साइंस या जनरल साइंस या मेडिसिन में ग्रेजुएट को भी बराबर की अहमियत मिलती है.

साथ ही अगर ग्रेजुएट फार्मेसी फील्ड से है तो उसे ड्रग मैन्युफैक्चरिंग में डेढ़ वर्ष (18 महीने) का अनुभव होना जरूरी है और दूसरों के लिए यह अनुभव सामान्यतः तीन वर्ष (36 महीने) का होता है.

यह अनुभव जिस क्षेत्र में नौकरी चाहिए उसी क्षेत्र का होना चाहिए जैसे बायोलॉजिकल प्रोडक्ट्स बनाने वाली मैन्युफैक्चरिंग यूनिट में बायोलॉजिकल प्रोडक्ट्स बनाने का अनुभव रखने वाला कैंडिडेट ही योग्य होगा.

अब आप भली भाँति अंदाजा लगा सकते हैं कि आपने फार्मेसी में जो ग्रेजुएशन की है उसका आपको मैन्युफैक्चरिंग इंडस्ट्री में क्या फायदा मिल रहा है? आपमें और एक साइंस ग्रेजुएट में डेढ़ वर्ष के अनुभव के अतिरिक्त क्या फर्क है? इस अनुभव के अतिरिक्त तो आप और साइंस ग्रेजुएट बराबर हैं.

क्या आपने फार्मेसी में ग्रेजुएशन इसलिए की थी कि आप और साइंस के ग्रेजुएट नौकरी के समय बराबर समझे जाएँ? फार्मेसी में ग्रेजुएशन का आपको इस अनुभव के अतिरिक्त क्या फायदा मिला?

जब सरकार फार्मेसी में ग्रेजुएशन करवा रही है तो उसे दवा निर्माण का विशेषज्ञ बनाने के लिए ही तो करवा रही है. कोर्स में भी यही सभ पढाया जाता है. अगर फार्मेसी का ग्रेजुएट दवा निर्माण में विशेषज्ञ है तो फिर दवा निर्माण के क्षेत्र में उसकी मोनोपोली क्यों नहीं हैं? ड्रग मैन्युफैक्चरिंग के क्षेत्र में फार्मेसी के ग्रेजुएट्स के अलावा दूसरी क्वालिफिकेशन के लोग क्यों लिए जाते हैं? आखिर यहाँ पर फार्मेसी ग्रेजुएट का विकल्प क्यों है?

दरअसल यह प्रश्न ना तो कभी फार्मेसी की नियामक संस्थाओं ने उठाया और ना ही कभी किसी टीचर्स और स्टूडेंट्स की तथाकथित संस्थाओं ने उठाया. अगर उँगलियों पे गिनों तो स्कोप ही स्कोप है लेकिन धरातल पर सब अलग है.

अब अगर डिसइन्फेक्टेंट फ्लुइड्स (Disinfectant Fluids), इन्सेक्टिसाइड्स (Insecticides), लिक्विड पैराफिन (Liquid Paraffin), मेडिकल गैसेस (Medicinal Gases), नॉन केमिकल कोंट्रासेप्टिव्स (Non-chemical Contraceptives), प्लास्टर ऑफ पेरिस (Plaster of Paris), सर्जिकल ड्रेसिंग्स (Surgical Dressings) आदि की मैन्युफैक्चरिंग की बात करें तो यहाँ पर फार्मेसी प्रोफेशनल के साथ-साथ किसी भी ग्रेजुएट की आवश्यकता नहीं है, कोई भी यह काम कर सकता है.

अगर मेडिकल डिवाइस (Medical Device) की मैन्युफैक्चरिंग यूनिट के सम्बन्ध में बात की जाए तो यहाँ पर फिजिक्स या केमिस्ट्री या माइक्रोबायोलॉजी (Microbiology) में से किसी एक विषय के साथ साइंस के ग्रेजुएट के साथ-साथ फार्मेसी और इंजीनियरिंग के डिग्री और डिप्लोमा धारी कैंडिडेट्स भी कार्य कर सकते हैं.

सबके लिए मेडिकल डिवाइस की मैन्युफैक्चरिंग और टेस्टिंग में काम करने का अनुभव होना चाहिए जो 18 महीनों से लेकर 48 महीनों तक है.

उपरोक्त सिचुएशन से आप स्वयं आंकलन कर सकते हैं कि एक फार्मेसी ग्रेजुएट की ड्रग मैन्युफैक्चरिंग इंडस्ट्री में कितनी अहमियत है. क्या आपने कहीं देखा है कि मेडिकल और इंजीनियरिंग के ग्रेजुएट्स का काम कोई अन्य व्यक्ति करता हो?

जब इनका कोई विकल्प नहीं है तो फिर मैन्युफैक्चरिंग, मार्केटिंग, होलसेल और रिटेल फार्मेसी आदि सभी जगहों पर फार्मासिस्ट का विकल्प क्यों हैं? दुर्भाग्य की बात तो यह है कि इस कार्य को सरकार के साथ-साथ फार्मेसी प्रोफेशन के लोग भी बढ़ावा देते आ रहे हैं.

हमें यह याद रखना चाहिए कि वैल्यू हमेशा विशेषज्ञ की होती है विकल्प की नहीं इसलिए जब तक हम विशेषज्ञ न होकर विकल्प रहेंगे तब तक हमारी ऐसी ही दुर्गति होती रहेगी.

आप मानकर चलिए कि जिस दिन ड्रग मैन्युफैक्चरिंग क्षेत्र में सिर्फ फार्मेसी ग्रेजुएट्स को कार्य करने का उनका अधिकार मिल गया उस दिन से ही फार्मेसी क्षेत्र मेडिकल और इंजीनियरिंग की तरह विद्यार्थियों की पहली पसंद भी बनने लग जाएगा.

Written by:
Ramesh Sharma

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