एपीटीआई फार्मेसी टीचर्स के पक्ष में क्यों नहीं आती है?

एपीटीआई फार्मेसी टीचर्स के पक्ष में क्यों नहीं आती है – पिछले विडियो में हमने फार्मेसी टीचर्स की समस्याओं के सम्बन्ध में चर्चा की थी. इनमे सबसे प्रमुख समस्या पिछले दो महीनों से टीचर्स को सैलरी नहीं मिलना या नाममात्र की सैलरी मिलना है.


आज हम फार्मेसी टीचर्स के एपीटीआई नामक संगठन की इन टीचर्स के प्रति भूमिका के सम्बन्ध में चर्चा करेंगे.

फार्मेसी टीचिंग और एजुकेशन के सभी मुद्दों को एक मंच प्रदान करने के लिए वर्ष 1966 में एसोसिएशन ऑफ फार्मास्यूटिकल टीचर्स ऑफ इंडिया (एपीटीआई) नामक संस्था का गठन किया गया था जिसका आज भी मुख्य उद्देश्य फार्मेसी टीचर्स के इंटरेस्ट को प्रोटेक्ट करना है. क्या यह संस्था सचमुच टीचर्स के इंटरेस्ट को प्रोटेक्ट कर पा रही है?

वैसे, जहाँ तक मुझे ज्ञात है इस संस्था के किसी भी पदाधिकारी ने आज तक कभी भी टीचर्स की सैलरी, जॉब आदि मुद्दों पर कभी भी बात नहीं की है. साथ ही इस संस्था के पदाधिकारी ना तो कभी टीचर्स को स्केल के मुताबिक सैलरी दिलवा पाए और ना ही कभी किसी टीचर को नौकरी से निकाले जाने पर उस संस्थान के विरुद्ध कुछ बोल पाए.

इन्होंने तो टीचर्स की नौकरी चले जाने का किसी मंच पर विरोध भी नहीं किया है. शायद ही आज तक कभी इन पदाधिकारियों द्वारा किसी कॉलेज मैनेजमेंट के समक्ष विरोध दर्शाया गया हो. चूँकि, इस संस्था के अधिकाँश पदाधिकारी स्वयं निजी कॉलेजों में कार्यरत हैं तो शायद इसलिए इनके मन में यह बात बैठी हुई है कि डरना जरूरी है.

सूत्रों से तो यह भी पता चला है कि इस संस्था के कुछ पदाधिकारियों की स्वयं की कॉलेजों में कोरोना के समय से ही नहीं बल्कि पिछले कई महीनों से सैलरी नहीं मिल रही है. अगर यह बात सत्य है तो ये पदाधिकारी जो अपनी कॉलेज में सैलरी नहीं दिलवा पा रहे हैं, ये दूसरी कॉलेजों के टीचर्स के लिए क्या कर पाएँगे?

जब कोई टीचर किन्ही मुद्दों का विरोध करें तो शायद वह चिंतातुर हो सकता है लेकिन दूसरा कोई उन मुद्दों पर बोले तो भी वह डरने लगे, ऐसा भी फार्मेसी टीचिंग में होता है. फार्मेसी की सारी कायनात उसे येन केन प्रकारेण सही रास्ता दिखाने में लग जाती है.

यह डर इतना अधिक है कि फार्मेसी के अधिकांश टीचर्स अपने हित में लिखी हुई या बोली हुई किसी बात को सोशल मीडिया या अन्य मंचों पर शेयर करने से डरते हैं. व्हाट्स एप पर भी शेयर करने से डरते हैं कि उनका नाम इसको शेयर करने में नहीं आना चाहिए.

एपीटीआई फार्मेसी टीचर्स के पक्ष में क्यों नहीं आती है

सब उस पोस्ट से ऐसे बचते हैं जैसे कि शेयर करते ही उनके आका उनका पत्ता साफ कर देंगे. आखिर अधिकांश ने अपने तथाकथित आका भी तो बना रखे हैं जिनके आशीर्वाद से कई दुर्लभ लक्ष्यों की प्राप्ति आसानी से हो जाती है.

खुद अपने हित के लिए नहीं बोलना और कोई और बोलता है तो उसे बोलने नहीं देना, आज के समय में अधिकांश लोगों का ध्येय बन चुका है.

इन सब के बीच मेरी नजर ओडिशा स्टेट के एपीटीआई प्रेसिडेंट मिहिर कार के फेसबुक प्रोफाइल पर पड़ी. 26 जून की इस पोस्ट में इन्होंने फार्मेसी प्रोफेशन के कई मुद्दों के साथ टीचर्स की सैलरी का मुद्दा भी उठा रखा था.

मैंने इस पोस्ट को पढ़ा तो मुझे आश्चर्य के साथ-साथ इनकी दबंगता देखकर खुशी हुई. मुझे इनके प्रोफाइल को दो बार चेक करना पड़ा कि क्या ये वास्तव में इसी प्रोफेशन से ही हैं? कुछ फार्मेसी के मित्रों से पूछा तब मन को संतुष्टि हुई कि वास्तव में ये फार्मेसी प्रोफेशन से ही है.

इनका फार्मेसी प्रोफेशनल होने के साथ-साथ एपीटीआई का पदाधिकारी होना भी अपने आप में महत्वपूर्ण है. मैंने अभी तक राजस्थान के साथ-साथ अन्य किसी राज्य के एपीटीआई पदाधिकारी को इस प्रकार के क्या किसी भी प्रकार के मुद्दों को उठाते नहीं देखा है.

अगर मिहिर कार जैसे लोग सभी स्टेट में एपीटीआई के पदाधिकारी बन जाएँ तो निश्चित रूप से फार्मेसी प्रोफेशन की दशा और दिशा में काफी बदलाव आएगा. परन्तु ऐसे लोगों का एपीटीआई के चुनाव में निर्वाचित हो पाना बड़ी टेढ़ी खीर है. सवाल खड़े करने वाले लोग किसी को पसंद नहीं आते हैं.

मुझे तो समझ में नहीं आया कि इनकों ओडिशा स्टेट की एपीटीआई में निर्वाचित होने का सौभाग्य कैसे मिल गया? इनकों निश्चित रूप से काफी परेशानियों का सामना करना पड़ा होगा.

इस एक आदमी के अतिरिक्त बाकी एपीटीआई क्या सो रही है? यह सभी राज्यों में विरोध प्रदर्शन क्यों नहीं कर रही है? क्या यह संगठन भी इसके सदस्यों की तरह से भयभीत है?

टीचर्स के मुद्दों के सम्बन्ध में ना बोलकर क्या एपीटीआई अपने उद्देश्य से नहीं भटक रही है? वैसे तो एपीटीआई द्वारा निरंतर रूप से APTICON नामक कन्वेंशन आयोजित करवाई जाती रही हैं जिसमे एक लम्बा चौड़ा जमावड़ा भी लगता है. लेकिन इसमें भाषण और भोजन के अतिरिक्त ज्यादा कुछ मतलब का नहीं निकलता है.

जब एपीटीआई अपने टीचर्स से मेम्बरशिप के 3500 रूपए लाइफटाइम और स्टूडेंट्स से 1000 रूपए वार्षिक शुल्क लेता है तो उसे इनके हितों की रक्षा के लिए भी आगे आना होगा. अब तक कुछ नहीं किया तो कोई बात नहीं लेकिन जब जागो तभी सवेरा माना जा सकता है.

Written by:
Ramesh Sharma

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