स्वामी विवेकानंद की खेतड़ी नरेश अजीत सिंह से आत्मीयता

स्वामी विवेकानंद की खेतड़ी नरेश अजीत सिंह से आत्मीयता - आध्यात्मिक शक्ति, ज्ञान व आकर्षक व्यक्तित्व के धनी स्वामी विवेकानंद सरस्वती का राजस्थान के शेखावाटी इलाके से गहरा संबंध रहा है.

झुंझुनूं के खेतड़ी कस्बे को वह अपना दूसरा घर बताते थे. जहाँ से पगड़ी व चोगा की वेशभूषा के साथ राजा अजीत सिंह ने उन्हें विवेकानंद नाम भी दिया. वहीं, उनका सीकर जिले से भी गहरा नाता रहा है.

जीणमाता होते हुए पहुँचे सीकर

अंग्रेजी बोलते सन्यासी को माउंट आबू में खेतड़ी महाराज अजीत सिंह के सचिव मुंशी जगमोहन ने देखा तो उन्होंने राजा को बताया. मांवड़ा से खेतड़ी बग्घी में आते हुए उन्होंने यहां की पहाडिय़ों व वनों का दृश्य देखा.

साथ ही सोने की तरह चमकने वाली बालू रेत ने स्वामी को प्रभावित किया. खेतड़ी, बाजोर, अलसीसर, भोपालगढ़ व पन्ना सागर तालाब देखने के बाद स्वामी विवेकानंद खेतड़ी नरेश अजीत सिंह के साथ 1891 में जयंती माता यानी जीणमाता के दर्शनों के लिए आए थे.

यहां सीकर के रावराजा माधोसिंह भी उपस्थित थे. यहां राजा माधोसिंह उनके व्यक्तित्व से काफी प्रभावित हुए थे. मारवाड़ी में उन्होंने स्वामी विवेकानंद को ‘सोवणा श्यामी’ कहकर अपने साथ सीकर चलने का आग्रह किया. राजा अजीत सिंह की सहमति पर वह सीकर आ गए.

स्वामी विवेकानंद की खेतड़ी नरेश अजीत सिंह से आत्मीयता

स्वामी रैवासाधाम, बाजोर होते हुए देवीपुरा स्थित माधव निवास कोठी में रूके. सीकर के सुभाष चौक स्थित गढ़ परिसर में सिंह दरवाजे के निकट बुर्ज में उन्हें ठहराया गया.

सीकर शहर के मध्य में स्थित ऐतिहासिक गढ़ का बुर्ज विश्व की एक महान थाती की यादों का साक्षी भी रहा है. इस बुर्ज में 127 वर्ष पहले 1891 में स्वामी विवेकानंद रुके थे. ये ऐतिहासिक धरोहर आज के जिम्मेदारों की अनेदखी के कारण अपने अस्तित्व के लिए संघर्ष कर रहा है. सीकर से विवेकानंद का नाता राव राजा माधोसिंह के जमाने से है.

एक दिन अपने संबोधन मेें स्वामी विवेकानंद ने भारत में ब्रिटिश व राजा महाराजाओं का राज खत्म होकर भविष्य में राज जनता के हाथ में आने की बात कही. इस बात पर माधोसिंह नाराज हो गए. घटना के बाद स्वामी विवेकानंद वापस खेतड़ी लौट गए.

पिपराली व सिंहासन होते हुए गए खेतड़ी

स्वामी विवेकानंद पिपराली, सिंहासन में कुछ समय श्याम सिंह लाडख़ानी की हवेली में भी ठहरे. रघुनाथगढ़, लोहार्गल, उदयपुरवाटी, चिराणा, गुहाला होते हुए खेतड़ी गए. यहां लंबे समय तक प्रवास में इन्होंने संस्कृत सीखी.

शिकागो में 11 सितम्बर 1893 को हुए विश्व धर्म सम्मेलन में स्वामी विवेकानंद ने जो पोशाक (चोगा व पगड़ी) पहनी थी, वह शेखावाटी के खेतड़ी की देन रही है. अब विवेकानंद की लगभग हर तस्वीर में वही पोशाक नजर आती है.

राजस्थान की गर्म जलवायु से स्वामी विवेकानंद को असुविधा होते देख खेतड़ी के तत्कालीन राजा अजीत सिंह ने उन्हें साफा पहनने की सलाह दी थी, बाद में यही साफा व चोगा उन्होंने शिकागो के सम्मेलन में पहना था.

इसके अलावा खेतड़ी आने से पहले उनका नाम विविदिषानंद था, यह नाम राजा को उच्चारण में सही नहीं लगता था, बाद में खेतड़ी के राजा ने ही विवेकानंद नाम दिया था. उनके पाँच नाम थे, जिनमें बचपन का नाम नरेन्द्र नाथ, कमलेश, सच्चिदानंद, विविदिषानंद और विवेकानंद. सबसे ज्यादा चर्चित वे खेतड़ी से मिले विवेकानंद नाम से हुए.

झुंझुनू जिले के खेतड़ी और विवेकानंद के रिश्ते

खेतड़ी के राजा अजीत सिंह ने ही विवेकानंद को पगड़ी व राजस्थानी अंगरखा भेंट किया, जो उनकी खास पहचान बन गए. खेतड़ी शैली का शाफा, अंगरखा एवं नामकरण का उपहार उन्हें शेखावाटी से ही मिला था. खेतड़ी शैली का साफा एवं अंगरखा पहनकर ही स्वामी विवेकानंद ने अमेरिका के शिकागों में भारत को प्रतिष्ठा दिलाई.

विवेकानंद नाम भी खेतड़ी की ही देन है. विवेकानंद का बचपन का नाम नरेंद्र था, लेकिन खेतड़ी महाराजा अजीत सिंह ने उनका नाम बदलकर विवेकानंद रख दिया. इसी नाम से विवेकानंद विश्वविख्यात हुए.

विश्व धर्म सम्मेलन में हिस्सा लेने शिकागो जाने के लिए हवाई जहाज के टिकट अजीत सिंह ने ही करवाकर दी थी.

विवेकानंद अपने जीवन काल में वर्ष 1891 से 1897 के बीच तीन बार खेतड़ी आए और कुल कुल 109 दिन रुके. सर्वप्रथम 7 अगस्त 1891 को आए एवं 82 दिन रुके, दूसरी बार 21 अप्रेल 1893को आए एवं 21 दिन रुके और तीसरी बार 12 दिसम्बर 1897 को शिकागो धर्म सम्मेलन से लौटने के बाद आकर 9 दिन रुके. स्वामी जी तीसरी बार खेतड़ी आए तब पूरे खेतड़ी कस्बे को 40 मण तेल से रोशनी करके सजाया गया था.

खेतड़ी सीमा पर बबाई से राजा अजीत सिंह स्वयं राजबग्घी में बैठकर स्वामी जी की अगवानी कर खेतड़ी लेकर आए. स्वामीजी खेतड़ी को अपना दूसरा घर बताते थे.

विवेकानंद ने राजस्थान के नाम लिखे थे 125 पत्र, इनमें से 8 खेतड़ी के नाम

स्वामी विवेकानंद का खेतड़ी कस्बे से विशेष लगाव रहा है. उन्होंने अपने जीवन में कुल 312 पत्र लिखे, इनमें से 125 पत्र राजस्थानवासियों के नाम थे. आठ पत्र खेतड़ीवालों के लिए लिखकर संदेश भेजे थे.

पहला पत्र - यह पत्र बीस सितम्बर 1892 को मुम्बई से खेतड़ी के पंडित शंकरलाल को लिखा. इसमें लिखा है कि हमें विदेश यात्रा करनी चाहिए, हमें यह जानना चाहिए कि दूसरे देशों में किस प्रकार की सामाजिक व्यवस्था चल रही है.

दूसरा पत्र - अमरीका रवाना होने से पहले मद्रास (वर्तमान में चेन्नई) से 15 फरवरी 1893 को राजा अजीतसिंह के नाम लिखा. इसमें कुंभकोणम गाँव की घटना का जिक्र किया है.

तीसरा पत्र - 22 मई 1893 को मुम्बई से राजा अजीत सिंह को लिखा कि प्रकृति ने मानव का निर्माण एक शाकाहारी जीव के रूप में किया है.

चौथा पत्र - 1894 को शिकागो से स्वामी अखंडानंद को लिखा कि खेतड़ी की निम्न जातियों के द्वार-द्वार जाओ. उन्हें धर्म का उपदेश दो और भूगोल और अन्य विषयों के विषयों पर मौखिक पाठ पढ़ाओ.

पाँचवा पत्र - 6 जुलाई 1895 को अमरीका से राजा अजीतङ्क्षसह के नाम लिखा कि मैंने इस देश में एक बीज बोया है, वह अभी पौधा बन गया है. शीघ्र ही वृक्ष बन जाएगा. मैं यहां कई सन्यासी बनाऊंगा. उन्हें काम सौंपकर भारत आऊंगा.

छठा पत्र - 11 अक्टूबर 1897 को खेतड़ी के मुंशी जगमोहनलाल को लिखा कि अजीत सिंह और मैं दो ऐसी आत्माएं हैं जो मानव समाज के कल्याण के लिए एक महान कार्य करने में परस्पर सहयोग करने के लिए जन्मे हैं. राजा अजीत सिंह नहीं होते तो शायद मैं यहाँ तक नहीं पहुँच सकता था.

सातवा पत्र - कोलकाता से 22 नवम्बर 1898 को लिखा इसमें राजा से अपनी मां व छोटे भाई की सहायता करने के लिए कहा है.

अंतिम पत्र - वेल्लूर मठ से 1898 को राजा के नाम अंतिम पत्र लिखा. इसमें उन्होंने कहा कि जीवन में केवल एक तत्व है जो किसी भी कीमत पर प्राप्त करने योग्य है और वह है प्रेम. अवंत और अथाह प्रेम, गगन की तरह विस्मृत है और समुद्र की तरह गहरा. यही एक जीवन की महान उपलब्धि है, जो यह प्राप्त कर लेता है वह भाग्यशाली है.

उपरोक्त सभी मूलपत्र अभी वेलूर मठ में एक धरोहर के रूप में सुरक्षित मौजूद है.

Written by:
Amit Kumar Joshi

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